अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में भूचाल ले आया है। होरमुज़ जलडमरूमध्य में आई रुकावटों ने कच्चे तेल की सप्लाई में बड़ी चिंता पैदा कर दी है। यह जलमार्ग दुनिया भर के लगभग 20% तेल और एलएनजी (LNG) की सप्लाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इसे 'वैश्विक तेल बाज़ार के इतिहास में सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा' बताया है और इसकी तुलना 1970 के दशक के बड़े ऊर्जा संकटों से की है।
तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि, सप्लाई पर भारी असर
इस तनाव का असर तुरंत बाज़ार पर दिखा। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतों में 40% से ज़्यादा का उछाल आया और यह $100 प्रति बैरल के ऊपर निकल गया। वहीं, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी $100 के करीब कारोबार कर रहा है। तनाव की वजह से WTI की कीमतों में पहले से ही $4 से $6 प्रति बैरल का इज़ाफ़ा हो चुका था। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) का अनुमान है कि अगर जलमार्ग एक महीने के लिए भी बंद रहा, तो तेल की कीमतें $1 से $15 प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं। होरमुज़ से होने वाले दैनिक तेल प्रवाह में भारी गिरावट आई है, जिसके चलते खाड़ी देशों को अपने उत्पादन में कम से कम 10 मिलियन (1 करोड़) बैरल प्रतिदिन की कटौती करनी पड़ रही है। अगर जलमार्ग बंद रहता है, तो यह कटौती 12 मिलियन (1.2 करोड़) बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकती है। सिर्फ कच्चे तेल पर ही नहीं, कतरएनर्जी (QatarEnergy) ने रास लाफन गैस कॉम्प्लेक्स में हुई हड़ताल के बाद एलएनजी (LNG) निर्यात पर 'फोर्स मैज्योर' (Force Majeure) घोषित कर दिया है, जिससे आने वाले सालों तक एलएनजी सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बदलते समीकरण और कूटनीति
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के अधिकारी अनवर गार्गाश ने क्षेत्रीय चिंताओं को उजागर करते हुए कहा है कि होरमुज़ तक पहुंच सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक आवश्यकता है। इस संकट ने देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर पुनर्विचार करने और सप्लाई के स्रोतों में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है। ईरान का ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की रणनीति खाड़ी देशों को वाशिंगटन के साथ और मजबूती से जोड़ती दिख रही है। यह स्थिति ऊर्जा संकट के चलते क्षेत्रीय शक्ति और सुरक्षा संरचनाओं को नए सिरे से आकार दे रही है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर चौतरफा असर और कूटनीतिक प्रयास
इस संघर्ष का असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है। अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो 2026 की पहली छमाही में वैश्विक जीडीपी ग्रोथ 0.6% तक कम हो सकती है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें मुद्रास्फीति (Inflation) को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे आम उत्पादों के दाम भी बढ़ रहे हैं। सप्लाई चेन की कमजोरियां और मौजूदा आर्थिक नाजुकता के बीच वैश्विक मंदी का खतरा भी बढ़ रहा है। सऊदी अरब, कतर, ओमान और मिस्र जैसे देश तनाव कम करने के लिए गहन कूटनीतिक प्रयासों में लगे हुए हैं। सऊदी अरब ने खास तौर पर खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सहयोगियों को ऐसे किसी भी कदम से बचने की सलाह दी है, जिससे तनाव और बढ़ सकता है। बाज़ार में अब भौतिक आपूर्ति की बाधाओं और लॉजिस्टिकल दिक्कतों को ज़्यादा महत्व दिया जा रहा है। अगर जलमार्ग चार हफ़्तों से ज़्यादा बंद रहता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और यह खाड़ी देशों के आर्थिक मॉडल के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।
लगातार बने खतरे और बढ़ते जोखिम
बावजूद इसके कि कुछ देश स्थिति को संभालने का दावा कर रहे हैं, यह संघर्ष गंभीर संरचनात्मक जोखिम पैदा कर रहा है। ईरान का नेतृत्व शासन बचाने पर केंद्रित है और ऐसी कार्रवाइयां कर रहा है, जिनसे क्षेत्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक व्यापार मार्गों को भारी नुकसान हो रहा है। कतर के एलएनजी (LNG) संयंत्रों पर हमले इस बात का एक गंभीर संकेत हैं कि ईरान महत्वपूर्ण ऊर्जा निर्यात को कैसे बाधित कर सकता है, जिसकी मरम्मत में तीन से पांच साल लग सकते हैं। कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन स्थिति बेहद अस्थिर बनी हुई है और आगे बढ़ने या किसी गलतफहमी का खतरा बना हुआ है। अमेरिका और इज़राइल के सैन्य अभियान, भले ही खतरों से निपटने के लिए हों, व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष को भड़का सकते हैं। यह नाजुक क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए सऊदी अरब जैसी देशों की चेतावनियाँ महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा, भले ही जलमार्ग फिर से खुल जाए, मिसाइलों के निरंतर खतरे टैंकरों के आवागमन को बाधित कर सकते हैं, जिससे सप्लाई चेन में रुकावटें और बीमा लागतें ऊंची बनी रहेंगी। दुनिया के ज्ञात तेल भंडार का 55% से अधिक नियंत्रित करने वाले इस चोकपॉइंट पर निर्भरता का जोखिम बहुत महत्वपूर्ण है। डर और पैनिक बाइंग (Panic Buying) से अस्थिरता और बढ़ सकती है, जिससे रणनीतिक भंडार (Strategic Reserves) की रिहाई अवरुद्ध हो सकती है और बाज़ार में अफरा-तफरी मच सकती है।