भारत के कॉमर्स मिनिस्टर Piyush Goyal और US ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव Jamieson Greer G20 समिट के दौरान एक अंतरिम ट्रेड एग्रीमेंट को अंतिम रूप देने पर चर्चा कर रहे हैं। इस मीटिंग का मुख्य फोकस अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी और भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए एक स्थिर माहौल तैयार करना है।
मिलवॉकी में हो रही यह हाई-लेवल बातचीत फरवरी 2026 में तैयार किए गए ढांचे को आगे बढ़ाने के लिए है। भारतीय निवेशकों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका पर निर्भर इंडस्ट्रीज के लिए एक स्थिर ट्रेड पॉलिसी ही बिजनेस को रफ्तार दे सकती है।
टैरिफ की चुनौती और भारत की मांग
फिलहाल, बातचीत का केंद्र अमेरिका द्वारा सेक्शन 301 जांच के बाद लगाए गए 10% टैरिफ हैं। भारत का जोर एक ऐसे मैकेनिज्म पर है जो भारतीय एक्सपोर्टर्स को ग्लोबल मार्केट में कॉम्पिटिटिव बनाए रखे, भले ही अमेरिका अपने टैरिफ स्ट्रक्चर में बदलाव करे। भारत के लिए टैरिफ रेट्स से ज्यादा जरूरी यह है कि कंपनियां अपने सप्लाई चेन और इन्वेस्टमेंट प्लान को लेकर एक 'प्रेडिक्टेबिलिटी' महसूस करें।
क्या है अमेरिका की मांग?
दूसरी तरफ, अमेरिकी अधिकारी भारत के घरेलू बाजारों तक बेहतर पहुंच बनाने की कोशिश में हैं। चुनौती यह है कि कैसे केवल वादों से आगे बढ़कर ठोस और व्यावहारिक नियम (Actionable Rules) बनाए जाएं, जो भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के हितों को भी सुरक्षित रखें।
भू-राजनीतिक (Geopolitical) दबाव का साया
व्यापारिक बातचीत के अलावा, रूस के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अमेरिकी विधायी दबावों के कारण यह मामला थोड़ा जटिल हो गया है। कुछ मामलों में टैरिफ के 100% तक पहुंचने का रिस्क भी बना हुआ है, जो इकोनॉमिक टॉक्स पर एक गहरा साया डाले हुए है। निवेशकों की नजर अब G20 मीटिंग के बाद आने वाले आधिकारिक बयानों पर है, जो तय करेंगे कि क्या दोनों देश किसी बड़े ब्रेकथ्रू की ओर बढ़ रहे हैं या बातचीत में अभी और देरी होगी।
