हाल ही में आयोजित UN समिट में दुनिया भर के नेताओं ने **90** गरीब देशों में शिक्षा के लिए **$3.5 बिलियन** की फंडिंग जुटाई है। हालांकि, यह राशि शिक्षा के विकास के लिए एक बड़ी राहत है, लेकिन एक्सपर्ट्स की मानें तो संघर्ष और जलवायु आपदाओं के कारण अभी भी **50 करोड़** से ज्यादा बच्चे स्कूल से दूर हैं, जो एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इस हालिया UN समिट में ग्लोबल एजुकेशन को मजबूत करने पर बड़ा जोर दिया गया। जुटी हुई $3.5 बिलियन की इस राशि का मकसद स्कूल सिस्टम को बेहतर करना और साक्षरता दर को सुधारना है। इस पैकेज की संरचना कुछ इस तरह है कि $2.1 बिलियन सरकारी और निजी दाताओं से आएंगे, जबकि $1.4 बिलियन का इंतजाम डेवलपमेंट बैंकों और प्राइवेट सेक्टर के सहयोग से किया जाएगा।
डेवलपमेंट फाइनेंस की बड़ी चुनौती
बड़ी फंडिंग के वादों के बावजूद, बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों और उपलब्ध फंड के बीच एक बड़ा फासला बना हुआ है। UN के विशेष दूत Gordon Brown ने चिंता जताई है कि 27.3 करोड़ बच्चे तो स्कूल के बाहर हैं ही, साथ ही 27 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो स्कूलों में होने के बावजूद 11 साल की उम्र तक बुनियादी साक्षरता भी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। मुख्य समस्या यह है कि कई देश अपने बजट का 20% हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने का लक्ष्य पूरा नहीं कर पाते, जिससे लंबे समय में प्रोजेक्ट्स को बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
इमरजेंसी फंड बनाम लॉन्ग-टर्म निवेश
संस्था Education Cannot Wait अब संकटग्रस्त क्षेत्रों में तुरंत पैसा पहुंचा रही है। इसमें गाजा और वेस्ट बैंक के लिए $30 लाख की मदद शामिल है, ताकि युद्ध प्रभावित बच्चों को राहत मिल सके। वहीं, सूडान में $2.2 करोड़ और नेपाल में बाढ़ प्रभावित स्कूलों की मरम्मत के लिए $10 लाख का इमरजेंसी फंड जारी किया गया है।
रिस्क और भविष्य की मॉनिटरिंग
इन्वेस्टर्स और ग्लोबल ऑब्जर्वर्स के लिए सबसे बड़ा रिस्क इन फंड्स का पारदर्शी इस्तेमाल है। युद्ध, जलवायु परिवर्तन और इंफ्रास्ट्रक्चर का विनाश प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ाने का कारण बनते हैं। अब नजर इस बात पर है कि ये वादे जमीनी हकीकत में कितनी जल्दी बदलते हैं और क्या स्थानीय सरकारें शिक्षा के लिए 20% का बजट बेंचमार्क हासिल करने में सफल हो पाती हैं या नहीं।
