जर्मनी के चांसलर Friedrich Merz बड़ी सियासी मुसीबत में घिर गए हैं। उनकी पार्टी CDU को मिली ऐतिहासिक हार और दक्षिणपंथी पार्टी AfD के बढ़ते प्रभाव से देश की इकोनॉमी और रिफॉर्म एजेंडे पर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
जर्मनी के चांसलर Friedrich Merz पर सियासी दबाव चरम पर है। Saxony-Anhalt राज्य में हुए चुनावों में उनकी पार्टी Christian Democratic Union (CDU) को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टी Alternative for Germany (AfD) ने 43.8% वोट हासिल कर सबको चौंका दिया है। अब नजरें 20 सितंबर, 2026 को होने वाले बर्लिन और Mecklenburg-Western Pomerania के चुनावों पर टिकी हैं, जो सरकार के भविष्य का फैसला कर सकते हैं।
इस बिगड़ते हालात को देखते हुए, चांसलर Merz ने अपनी न्यूयॉर्क में होने वाली UN General Assembly की यात्रा भी रद्द कर दी है, ताकि वह बर्लिन में बढ़ते आंतरिक पार्टी तनाव को संभाल सकें।
इकोनॉमी पर क्या पड़ेगा असर?
दुनिया की सबसे बड़ी यूरोपीय इकोनॉमी होने के नाते, जर्मनी में राजनीतिक अस्थिरता का असर ग्लोबल निवेशकों पर भी पड़ेगा। Merz का एजेंडा जर्मनी की सुस्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का था, लेकिन मौजूदा राजनीतिक संकट के कारण सरकारी सुधारों (Economic Reforms) में रुकावट आने का खतरा पैदा हो गया है। अगर CDU को क्षेत्रीय स्तर पर और नुकसान होता है, तो Bundesrat (जर्मनी की विधायी संस्था) में विरोध के कारण सरकार के लिए कोई भी नीति लागू करना मुश्किल हो जाएगा।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
CDU/CSU गठबंधन के भीतर नेतृत्व बदलने की चर्चाओं ने अनिश्चितता बढ़ा दी है। AfD का बढ़ता वर्चस्व पारंपरिक पार्टियों के लिए सत्ता में बने रहने के लिए नए और कमजोर गठबंधन बनाने की चुनौती पेश कर रहा है। 20 सितंबर के चुनाव परिणाम चांसलर Merz के नेतृत्व के लिए एक तरह का 'रेफरेंडम' साबित होंगे। बाजार के जानकारों की नजर इस बात पर है कि क्या सरकार अपनी स्थिति संभाल पाएगी, या जर्मनी लंबे समय तक 'लेजिसलेटिव ग्रिडलॉक' का शिकार हो जाएगा, जिसका सीधा असर पूरे यूरोप की इकोनॉमी पर पड़ेगा।
