डॉलर का दबदबा खत्म? भारत-रूस-UAE की तिकड़ी से ग्लोबल फाइनेंस में आया बड़ा मोड़!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
डॉलर का दबदबा खत्म? भारत-रूस-UAE की तिकड़ी से ग्लोबल फाइनेंस में आया बड़ा मोड़!
Overview

दुनियाभर में आर्थिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। भारत, रूस और UAE आपस में आर्थिक और वित्तीय रिश्ते मजबूत कर रहे हैं, जिससे पुराने तरीकों को दरकिनार कर नई समानांतर व्यवस्थाएं बन रही हैं। ऊर्जा की जरूरतें और प्रतिबंधों से बचने की कवायद इस गठजोड़ को ताकत दे रही है, जो डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) को बढ़ावा देकर मल्टीपोलर ग्लोबल इकोनॉमी की ओर ले जा रही है।

भू-राजनीतिक मोड़: नई आर्थिक धमनियां बना रहे हैं भारत, रूस और UAE

दुनियाभर में भू-राजनीतिक चालें ग्लोबल फाइनेंस के तौर-तरीके को तेजी से बदल रही हैं। देश अब पारंपरिक निर्भरता से आगे बढ़कर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के लिए समानांतर आर्थिक ढांचे तैयार कर रहे हैं। भारत, रूस और UAE के बीच गहराते रिश्ते इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। यह गठबंधन, जो शुरू में ऊर्जा सुरक्षा और प्रतिबंधों से बचने के लिए बना था, अब मल्टीपोलर फाइनेंशियल ऑर्डर (Multipolar Financial Order) को आकार देने वाली एक बड़ी ताकत बन चुका है।

व्यापार में रिकॉर्ड उछाल, डॉलर को चुनौती

हाल के फाइनेंशिल ईयर (Financial Year) में भारत और रूस के बीच व्यापार में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है। यह द्विपक्षीय व्यापार FY21 में करीब $13 बिलियन से बढ़कर FY25 तक अनुमानित $69 बिलियन तक पहुंच गया है। इस भारी वृद्धि के पीछे मुख्य रूप से ऊर्जा निर्यात का बड़ा हाथ है। भारत के कुल क्रूड इम्पोर्ट्स (Crude Imports) में रूस की हिस्सेदारी 2% से बढ़कर FY25 तक करीब 40% हो गई है।

वहीं, भारत और UAE के बीच व्यापार FY25 तक $100 बिलियन के आंकड़े को पार कर गया है, जो FY21 में $43 बिलियन था। UAE अब भारत का दूसरा सबसे बड़ा LNG सप्लायर बन गया है, खासकर 10-साल के LNG कॉन्ट्रैक्ट के बाद।

सबसे अहम बात यह है कि ये रिश्ते नए सेटलमेंट मैकेनिज्म (Settlement Mechanism) भी बना रहे हैं। रूस अपने अतिरिक्त रुपये का इस्तेमाल भारतीय कैपिटल मार्केट्स (Capital Markets) में निवेश करने के लिए कर रहा है, जैसे Sberbank के Nifty 50 ऑफरिंग जैसे स्पेशलाइज्ड फंड्स (Specialized Funds) के जरिए। यह कदम पारंपरिक डॉलर-आधारित सिस्टम को सीधे चुनौती देता है और डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) प्रयासों का एक मुख्य स्तंभ है।

मल्टीपोलरिटी और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स

भारत, रूस और UAE का यह गठजोड़ सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि गैर-ऊर्जा क्षेत्रों में भी इनका विस्तार हो रहा है। यह साफ संकेत है कि ये पार्टनरशिप्स लंबी अवधि के लिए हैं। यह आर्थिक मल्टीपोलरिटी (Economic Multipolarity) के वैश्विक रुझान के अनुरूप है, जहां अमेरिका, चीन, यूरोप और भारत जैसी कई बड़ी आर्थिक शक्तियां वैश्विक व्यापार को आकार दे रही हैं।

खाड़ी देशों के सॉवरेन वेल्थ फंड्स (Sovereign Wealth Funds - SWFs) भी भारत में रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy), इंफ्रास्ट्रक्चर और हेल्थकेयर जैसे सेक्टर्स में निवेश बढ़ा रहे हैं। ADIA, Mubadala और ADQ जैसे बड़े फंड्स इसमें आगे हैं।

इसी के साथ, इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) जैसे महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स भी आगे बढ़ रहे हैं। इसका लक्ष्य रेल, शिपिंग, ऊर्जा और डिजिटल नेटवर्क के जरिए महाद्वीपों को जोड़ना है। इसे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (Belt and Road Initiative) के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है और यह वैकल्पिक वैश्विक व्यापार मार्ग बनाने का एक बड़ा प्रयास है।

चुनौतियां और जोखिम

हालांकि, इन नई साझेदारियों में कुछ जोखिम भी हैं। पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रतिबंध और दूसरे दर्जे के उपाय (Secondary Measures) व्यापारिक रिश्तों को प्रभावित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, 2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों और कंप्लायंस रिस्क (Compliance Risk) के कारण भारत का रूस से क्रूड ऑयल इम्पोर्ट्स करीब 18% तक गिर गया, जिससे भारत को अमेरिका और UAE से ऊर्जा आयात बढ़ाना पड़ा।

IMEC प्रोजेक्ट को भी मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड फ्रिक्शन (Trade Friction) जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। यूरोपीय संघ (EU) को भी खाड़ी देशों में अपना प्रभाव बनाए रखने में मुश्किल हो रही है, जहां चीन की आर्थिक पकड़ मजबूत हो रही है। इसके अलावा, डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) के प्रयासों के बावजूद, महत्वपूर्ण वैश्विक वित्तीय कामों के लिए डॉलर पर निर्भरता अभी भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।

भविष्य की तस्वीर: एक खंडित पर गतिशील ग्लोबल ऑर्डर

विश्लेषकों का मानना है कि धीरे-धीरे मल्टीपोलर करेंसी सिस्टम (Multipolar Currency System) की ओर झुकाव बढ़ेगा। डॉलर का दबदबा बना रहेगा, लेकिन अन्य प्रमुख मुद्राओं की हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। रूस जैसे देश अतिरिक्त स्थानीय मुद्राओं का उपयोग भारत जैसे बढ़ते बाजारों में निवेश के लिए कर रहे हैं, और IMEC जैसे प्रोजेक्ट्स इस रणनीतिक विविधीकरण को दर्शाते हैं। खाड़ी देशों के SWFs का इमर्जिंग मार्केट इकोनॉमीज (Emerging Market Economies) में निवेश इस ट्रेंड को और मजबूत करता है। निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए यह एक खंडित, लेकिन गतिशील वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती होगी।

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