France Crisis: विरोध प्रदर्शनों से दहला फ्रांस, कर्ज के बोझ में दबी अर्थव्यवस्था पर बढ़ा खतरा

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AuthorNeha Patil|Published at:
France Crisis: विरोध प्रदर्शनों से दहला फ्रांस, कर्ज के बोझ में दबी अर्थव्यवस्था पर बढ़ा खतरा

फ्रांस में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एजुकेशन रिफॉर्म्स को खारिज करने के बाद उपजा यह तनाव रिटेल बिजनेस को प्रभावित कर रहा है, जबकि देश का पब्लिक डेट (Public Debt) जीडीपी के **120%** के करीब पहुंच गया है, जिससे निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं।

फ्रांस में छात्र समूहों और सरकार के बीच तनातनी बढ़ती जा रही है। हाल ही में छात्र नेताओं ने सरकार के शिक्षा सुधार प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिससे देश में जारी अशांति और तेज हो गई है। यह स्थिति न केवल वहां की लोकल रिटेल एक्टिविटी को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि उन ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स के लिए भी अनिश्चितता पैदा कर रही है जो यूरोज़ोन की स्थिरता पर नजर रखते हैं।

कर्ज का बढ़ता दबाव

फ्रांस फिलहाल कर्ज के भारी बोझ से जूझ रहा है। पब्लिक डेट का आंकड़ा कुल आर्थिक उत्पादन (GDP) के 120% के आसपास मंडरा रहा है। यह विकट स्थिति सरकार के लिए किसी भी तरह की वित्तीय राहत देने या प्रदर्शनकारियों की मांगें मानने की गुंजाइश खत्म कर देती है, क्योंकि खर्च बढ़ाने से बजट का गणित और बिगड़ सकता है। हालांकि क्रेडिट रेटिंग एजेंसी Moody’s ने हाल ही में देश की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को डाउनग्रेड नहीं किया है, लेकिन बाजार का माहौल अभी भी काफी नाजुक बना हुआ है।

रिटेल और बिजनेस पर चोट

लंबे समय से चल रहे इन विरोध प्रदर्शनों का सीधा असर स्थानीय कारोबार पर दिख रहा है। रिटेलर्स ने बिक्री में भारी गिरावट दर्ज की है और कई दुकानों को हिंसा के डर से बंद रखना पड़ रहा है। चूँकि रिटेल स्पेंडिंग अर्थव्यवस्था का एक मुख्य हिस्सा है, इसलिए यह व्यवधान आने वाले दिनों में और अधिक आर्थिक दबाव पैदा कर सकता है।

सियासी हलचल और भविष्य का रिस्क

राजनीतिक ध्रुवीकरण भी गहराता जा रहा है। अब तक हुई झड़पों के बाद 1,400 से ज्यादा गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। 5 नवंबर को होने वाले राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन सरकार के लिए एक अग्निपरीक्षा साबित हो सकते हैं। इस बीच, राजनीतिक गलियारों में Marine Le Pen का प्रभाव भी बढ़ा है, जिनकी पोलिंग रेटिंग लगभग 33% के आसपास है। निवेशकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार स्थिति को काबू कर पाएगी, क्योंकि इसका असर यूरो और यूरोपियन इक्विटी मार्केट्स पर लंबे समय तक बना रह सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.