अप्रैल-जून 2026 तिमाही में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से करीब **$4.66 अरब** निकाल लिए, भले ही BSE Sensex **6.9%** बढ़ा। ऊंची वैल्यूएशन और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड जैसे ग्लोबल फैक्टर्स इसके पीछे थे। हालांकि, जुलाई 2026 में यह ट्रेंड बदला और विदेशी निवेशक फिर से खरीदार बन गए।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी
अप्रैल से जून 2026 तिमाही के दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय इक्विटी से पैसा निकालना जारी रखा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस तीन महीने की अवधि में $4.66 अरब का पैसा भारत-केंद्रित ऑफ-शोर फंडों से बाहर चला गया। यह बिकवाली तब हुई जब भारतीय शेयर बाजार में तेजी देखी जा रही थी। उदाहरण के लिए, इसी दौरान BSE Sensex 6.9% चढ़ा, जबकि मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स में इससे भी बड़ी बढ़त दर्ज की गई।
बिकवाली के पीछे की वजहें
विदेशी निवेशकों के अपने होल्डिंग्स कम करने के पीछे कई कारण थे। वैश्विक निवेशक अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर ऊंचे ब्याज दरों और मजबूत अमेरिकी डॉलर को लेकर सतर्क थे, जिससे उभरते बाजारों (Emerging Markets) जैसे भारत में सुरक्षित रिटर्न की तलाश कम आकर्षक हो जाती है। इसके अलावा, कुछ वैश्विक निवेशकों को लगा कि भारतीय शेयर अन्य देशों की तुलना में महंगे हो गए हैं, जिसके चलते उन्होंने अपने पोर्टफोलियो को दूसरे बाजारों की ओर मोड़ा। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ने भी इस सतर्क रुख को और बढ़ाया।
डोमेस्टिक निवेशकों का दबदबा
यह तथ्य कि विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार बढ़ते रहे, घरेलू निवेशकों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Domestic Institutional Investors), जैसे कि भारतीय म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) और बीमा कंपनियां, बाजार के लिए एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरे हैं। उन्होंने लगातार विदेशी निवेशकों द्वारा बेचे गए शेयरों को खरीदा, जिससे कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिली और सूचकांकों (Indices) को तिमाही के दौरान उच्च स्तर पर पहुंचने में सहायता मिली।
फंडों के बीच अंतर
विदेशी निवेश के भीतर भी पैसे के प्रवाह में स्पष्ट अंतर देखा गया। एक्टिवली मैनेज्ड फंड्स (Actively Managed Funds), जहां पेशेवर मैनेजर विशेष शेयरों का चयन करते हैं, एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) की तुलना में काफी बड़ी आउटफ्लो (Outflows) देखे गए। ETFs का उपयोग करने वाले निवेशक अक्सर व्यापक बाजार रुझानों और लागतों के आधार पर जल्दी से पैसे अंदर-बाहर करते हैं, जबकि एक्टिव फंड्स का दृष्टिकोण आम तौर पर अधिक लंबी अवधि का होता है।
जुलाई में आई तेजी की लहर
तिमाही समाप्त होने के बाद से सेंटिमेंट (Sentiment) में बदलाव आया है। जुलाई 2026 में, विदेशी निवेशकों ने लगभग ₹20,200 करोड़ का निवेश करके फिर से खरीदार के रूप में वापसी की। इस व्यवहार में बदलाव बेहतर बाजार वैल्यूएशन और वैश्विक आर्थिक माहौल के स्थिर होने के संकेतों से जुड़ा है। विदेशी निवेशकों ने अपने सेक्टर फोकस को भी बदला, बैंकिंग और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों से पैसा निकालकर इंडस्ट्रियल्स, आईटी (IT) और हेल्थकेयर जैसे उद्योगों में अपना दांव बढ़ाया।
आगे क्या?
निवेशकों के लिए, आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विदेशी धन का प्रवाह घरेलू खरीदारी के साथ कैसे इंटरैक्ट करता है। हालांकि विदेशी बिकवाली धीमी हो गई है, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव या अमेरिकी मौद्रिक नीति में बदलाव जैसी वैश्विक घटनाएं अभी भी सेंटिमेंट में अचानक बदलाव ला सकती हैं। यदि विदेशी निवेशक फिर से पीछे हटने का फैसला करते हैं तो घरेलू निवेशक शेयर की कीमतों को सहारा देना जारी रखेंगे या नहीं, इस पर भारतीय बाजार की स्थिरता निर्भर करेगी।
