China Pharma Rules: भारतीय दवा कंपनियों पर गिरी गाज! चीनी बाज़ार में एंट्री हुई मुश्किल

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AuthorMehul Desai|Published at:
China Pharma Rules: भारतीय दवा कंपनियों पर गिरी गाज! चीनी बाज़ार में एंट्री हुई मुश्किल

चीन के नए नियम भारतीय दवा निर्यातकों के लिए बड़ी मुसीबत बन गए हैं। अब चीन में दवा खरीदने के लिए चीनी अथॉरिटी से अप्रूव्ड GMP रिपोर्ट जरूरी होगी, जिससे भारत की करीब **$270 मिलियन** की एक्सपोर्ट पर खतरा मंडरा रहा है।

चीन के नए नियम क्या हैं?

चीन ने अपनी 12वीं वॉल्यूम-बेस्ड प्रोक्योरमेंट (Volume-Based Procurement) के लिए एक नया नियम जारी किया है। इसके तहत, अब विदेशी दवा निर्माताओं को गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस (GMP) निरीक्षण रिपोर्ट देनी होगी, जिसे खास तौर पर चीनी अथॉरिटी ने मंजूरी दी हो। अब तक यह नियम लागू नहीं था। भारतीय दवा उद्योग के लिए यह एक बड़ा हर्डल माना जा रहा है, क्योंकि वे ग्लोबल सर्टिफिकेशन पर निर्भर करते हैं।

कितना बड़ा है खतरा?

इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (Indian Drug Manufacturers' Association) इस बात का पता लगा रही है कि कौन से प्रोडक्ट्स और मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी इस नियम के कारण बाहर हो सकते हैं। चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दवा बाज़ार है, जिसका साइज़ करीब $250 बिलियन है। भारतीय कंपनियां अभी चीन को सालाना $240 मिलियन से $270 मिलियन का रॉ मटेरियल एक्सपोर्ट करती हैं। लेकिन वहीं, भारत चीन से $3.2 बिलियन के बल्क ड्रग्स और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) इम्पोर्ट करता है।

क्या है मार्केट एक्सेस पर असर?

इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि यह नियम टैरिफ के अलावा एक ट्रेड बैरियर (Non-tariff trade barrier) की तरह काम कर सकता है। पहले भी चीन विदेशी दवाओं के रजिस्ट्रेशन को सीमित रखता था, खासकर एंटी-कैंसर जैसी दवाओं को प्राथमिकता देकर। अगर भारतीय कंपनियां चीनी अथॉरिटी से अप्रूव्ड इंस्पेक्शन रिपोर्ट हासिल नहीं कर पाती हैं, तो वे सरकारी प्रोक्योरमेंट प्रोग्राम में कंपीट नहीं कर पाएंगी। इससे मौजूदा ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) और बढ़ सकता है।

भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए स्ट्रैटेजिक चैलेंज

यह रेगुलेटरी बदलाव इस बात को दिखाता है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स अभी भी मार्केट एक्सेस और कच्चे माल की सप्लाई के लिए कितने निर्भर हैं। भारत जेनेरिक दवाओं के प्रोडक्शन में भले ही आगे हो, लेकिन APIs और केमिकल इंटरमीडिएट्स के लिए वह चीन पर बहुत ज्यादा निर्भर है। ऐसे में, अगर बीजिंग इंस्पेक्शन स्टैंडर्ड्स को टाइट करता है, तो यह डबल रिस्क पैदा करेगा – एक तरफ चीन में फिनिश्ड गुड्स बेचना मुश्किल होगा, वहीं दूसरी तरफ भारत में दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल की सप्लाई चेन में भी दिक्कत आएगी।

इस स्थिति ने भारत में क्रिटिकल स्टार्टिंग मैटेरियल्स और इंटरमीडिएट्स के लोकल प्रोडक्शन को तेज करने की मांग को फिर से हवा दी है। डोमेस्टिक API मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूत करना सप्लाई चेन के रिस्क को कम करने के लिए जरूरी माना जा रहा है। इन्वेस्टर्स के लिए, यह देखना अहम होगा कि कितनी भारतीय कंपनियां इन नए इंस्पेक्शन ऑडिट्स को पास कर पाती हैं, भारतीय फर्म्स के लिए कुल कितने टेंडर्स उपलब्ध रहते हैं, और क्या भारत और चीन के बीच इन रेगुलेटरी चिंताओं को दूर करने के लिए कोई सरकारी स्तर पर बातचीत होती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.