चीनी वैज्ञानिकों की नई रिसर्च ने ब्रह्मपुत्र नदी (Yarlung Tsangpo) के बहाव को लेकर चिंता बढ़ा दी है। तिब्बत के मेडोग (Medog) में चीन का **60,000 मेगावाट** का विशाल हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भारत और बांग्लादेश के लिए जल सुरक्षा के लिहाज से बड़ी चुनौती बन सकता है।
चीन की एकेडमी ऑफ साइंसेज और युन्नान यूनिवर्सिटी की हालिया रिसर्च ने चिंताजनक संकेत दिए हैं। पिछले 700 वर्षों के ट्री-रिंग रिकॉर्ड का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस इलाके में पानी का बहाव तेजी से बढ़ रहा है, जिससे बाढ़ की घटनाएं अधिक फ्रीक्वेंट हो गई हैं।
भौगोलिक जोखिम और चुनौती
चीन जिस मेडोग (Medog) इलाके में यह विशाल डैम बना रहा है, वह टेक्टोनिक प्लेट्स के बहुत करीब और अत्यधिक भूकंपीय (Seismic) जोन में आता है। भूगर्भ वैज्ञानिकों का मानना है कि सक्रिय फॉल्ट लाइन्स और बदलता मौसम लैंडस्लाइड्स का खतरा पैदा कर सकते हैं, जो न केवल डैम की स्टेबिलिटी के लिए खतरा हैं बल्कि नदी के प्राकृतिक बहाव को भी बाधित कर सकते हैं। यह प्रोजेक्ट साइज में 'थ्री गोर्जेस डैम' (Three Gorges Dam) से भी बड़ा होने की योजना है, जो इसे इंजीनियरिंग के लिहाज से बेहद जटिल बनाता है।
भारत पर क्या होगा असर?
ब्रह्मपुत्र नदी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए लाइफलाइन है। कृषि सिंचाई से लेकर क्षेत्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर तक, सब कुछ इस नदी पर निर्भर है। यदि नदी के हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम में बदलाव आता है, तो भारत को बाढ़ और सूखे के प्रबंधन के लिए अपनी नीतियों को फिर से तैयार करना पड़ सकता है। हाल के दिनों में हिमालयी क्षेत्रों में आई बर्फ और चट्टानों की आपदाओं ने पहले ही इन्फ्रास्ट्रक्चर की संवेदनशीलता को जगजाहिर कर दिया है।
निवेशकों और योजनाकारों के लिए संकेत
हालांकि चीन का दावा है कि वे जोखिमों को मैनेज करने के लिए व्यापक इंजीनियरिंग कर रहे हैं, लेकिन स्वतंत्र वैज्ञानिक डेटा बताते हैं कि ट्रांस-बाउंड्री वाटर मैनेजमेंट पर नजर रखना अब बेहद जरूरी हो गया है। पूर्वोत्तर भारत में जल संसाधनों और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर आधारित उद्योगों के लिए भविष्य में वाटर-शेयरिंग और पर्यावरण आकलन से जुड़े अपडेट्स पर नजर रखना निवेशकों के लिए अहम होगा।
