इस साल अमेरिका अपना **250वां** साल मना रहा है, और इसी के साथ एक खास किताब 'My Experiences of America' (मेरी अमेरिका यात्रा) का शताब्दी वर्ष भी है। 1926 में प्रकाशित यह किताब भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भूपेंद्रनाथ दत्ता की अमेरिका में शुरुआती 20वीं सदी के पूंजीवाद और नस्लीय असमानता पर एक अनोखी समाजशास्त्रीय समीक्षा पेश करती है।
भारत से अमेरिका: एक क्रांतिकारी का समाजशास्त्रीय विश्लेषण
स्वामी विवेकानंद के भाई, भूपेंद्रनाथ दत्ता, 1908 से 1914 तक अमेरिका में रहे। भारत में राजद्रोह के आरोपों के चलते उन्हें देश छोड़ना पड़ा था। अमेरिका में उन्होंने न्यूयॉर्क में समाजशास्त्र और मानव विज्ञान की पढ़ाई की, जिसने उन्हें वहां के समाज को गहराई से समझने का मौका दिया। 1926 में प्रकाशित उनकी किताब 'Amar Amerikar Abhijnota' ('My Experiences of America') इसी अध्ययन का नतीजा है।
अमेरिकी पूंजीवाद और समाज पर पैनी नजर
यह किताब उस दौर की अन्य यात्रा वृत्तांतों से अलग है। जहां कई लोग अमेरिका की नागरिक संस्कृति और आजादी की तारीफ करते थे, दत्ता ने एक विश्लेषक की तरह वहां की व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर किया। उन्होंने तर्क दिया कि बेलगाम पूंजीवाद और गहरी जड़ें जमा चुकी नस्लीय व्यवस्था ने मिलकर देश के समानता के मूल सिद्धांतों को खोखला कर दिया था। उन्होंने स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी जैसी प्रतीकात्मक संस्थाओं पर भी सवाल उठाए, क्योंकि वे हाशिए पर पड़े लोगों के वास्तविक अनुभवों से कोसों दूर थीं।
ऐतिहासिक अनदेखी और आधुनिक प्रासंगिकता
दत्ता की यह महत्वपूर्ण समीक्षा ज्यादातर लोगों तक नहीं पहुंच सकी, क्योंकि यह मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखी गई थी और इसका व्यापक अनुवाद नहीं हुआ। 1927 में कैथरीन मेयो की 'Mother India' जैसी किताबों के विपरीत, दत्ता की आवाज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनसुनी रह गई। इसके अलावा, उन्हें अक्सर एक शहीद क्रांतिकारी के बजाय एक समाजशास्त्री के तौर पर देखा गया, जिससे उनके अकादमिक योगदान पर पर्दा पड़ गया।
आज, इतिहास और समाज-अर्थव्यवस्था के छात्र दत्ता की बातों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। उन्होंने नस्लीय अलगाव और शासन पर पूंजी के प्रभाव की जड़ों को पहचाना, जो आज भी सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को समझने के लिए एक ढांचा प्रदान करता है। यह किताब हमें यह सिखाती है कि विभिन्न देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास को समझने के लिए हमें अलग-अलग नजरियों पर भी गौर करना चाहिए, जो लंबी अवधि के सामाजिक जोखिमों को समझने में निवेशकों और नीति-विश्लेषकों की मदद कर सकता है।
