Bangladesh और China अब म्यांमार के रास्ते एक नए ट्रेड कॉरिडोर पर बातचीत कर रहे हैं। इस पहल का मकसद बे ऑफ बंगाल और Mongla Port के विकास के जरिए कनेक्टिविटी बढ़ाना है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं।
चीन और बांग्लादेश के बीच हुई हालिया राजनयिक चर्चाओं में म्यांमार के रास्ते एक नए कनेक्टिविटी कॉरिडोर का प्रस्ताव सामने आया है। जूनियन फॉरेन मिनिस्टर Shama Obaed Islam और चीनी एंबेसडर Yao Wen के बीच 14-15 सितंबर, 2026 को हुई बातचीत में इस प्रोजेक्ट पर जोर दिया गया है। यह पुराना और ठंडे बस्ते में पड़ा BCIM (Bangladesh-China-India-Myanmar) कॉरिडोर से अलग एक नई कोशिश है।
इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य दक्षिण-पश्चिमी चीन को बे ऑफ बंगाल तक सीधी पहुंच प्रदान करना है। इसमें Mongla Port का आधुनिकीकरण और बांग्लादेश में विशेष 'चीनी इकोनॉमिक जोन्स' बनाने की योजना है। चीन के लिए यह स्ट्रैटेजिक मूव है ताकि वह 'Strait of Malacca' पर अपनी निर्भरता को कम कर सके, जो ग्लोबल शिपिंग के लिए एक बड़ा चोकपॉइंट है।
एग्जीक्यूशन और स्ट्रैटेजिक रिस्क
निवेशक इस प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता (viability) को लेकर सतर्क हैं। म्यांमार में जारी आंतरिक संघर्ष और अस्थिरता किसी भी सीमा-पार बुनियादी ढांचा परियोजना के लिए बड़ा जोखिम है। ऐसे अशांत क्षेत्र में कॉरिडोर बनाना न केवल महंगा होगा, बल्कि इसमें सुरक्षा संबंधी चुनौतियों और देरी की पूरी संभावना है।
इसके अलावा, एशिया में ऐसी बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर अक्सर 'Debt Sustainability' यानी कर्ज चुकाने की क्षमता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अगर यह प्रोजेक्ट तत्काल ट्रेड रिटर्न नहीं देता, तो बांग्लादेश पर वित्तीय बोझ बढ़ सकता है।
भू-राजनीतिक (Geopolitical) चुनौतियां
यह प्रोजेक्ट भारत के लिए भी काफी संवेदनशील है। भारत लंबे समय से अपनी सीमाओं के पास चीन के बढ़ते बुनियादी ढांचे के विस्तार को लेकर सतर्क रहा है। बे ऑफ बंगाल क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी को क्षेत्र के पावर बैलेंस में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। मार्केट एनालिस्ट अब इस पर नजर बनाए हुए हैं कि इस प्रोजेक्ट के चलते आने वाले समय में क्षेत्रीय व्यापार नीतियों में क्या बदलाव आते हैं।
