भारत की अध्यक्षता में BRICS देशों ने टैक्स और कस्टम्स सहयोग के लिए एक नए फ्रेमवर्क को मंजूरी दी है। इस कदम का मकसद क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड को आसान बनाना और व्यापार में आने वाली अड़चनों को कम करना है।
नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने इंटरनेशनल टैक्सेशन और कस्टम्स प्रोटोकॉल को मजबूत करने पर सहमति जताई है। भारत की अगुवाई में हुई इस पहल का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच एक एकीकृत व्यापारिक माहौल तैयार करना है। इसमें टैक्स और ट्रांसफर प्राइसिंग (Transfer Pricing) के लिए विशेष वर्किंग ग्रुप्स बनाए जाएंगे, ताकि ग्लोबल टैक्स नियमों को बेहतर ढंग से लागू किया जा सके।
क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड पर असर
इस समझौते के तहत BRICS Authorised Economic Operator (AEO) Action Plan 2026 को लागू किया जाएगा। यह एक तरह की 'फास्ट लेन' होगी, जिससे भरोसेमंद कारोबारियों को सीमा पार व्यापार में कम प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा, जॉइंट कस्टम्स ऑपरेशंस को अब हर साल आयोजित करने का फैसला लिया गया है, जिससे सिक्योरिटी और ट्रेड में पारदर्शिता बढ़ेगी।
निवेशकों के लिए संकेत
जो कंपनियां BRICS देशों में काम कर रही हैं, उनके लिए यह नियमों में स्पष्टता लाने वाला कदम है। ट्रांसफर प्राइसिंग पर फोकस करने से मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए टैक्स की उम्मीदें और अधिक मानकीकृत (standardized) हो सकती हैं। साथ ही, 'BRICS Tax Support Network' के गठन से सदस्य देशों के टैक्स अधिकारियों की कार्यक्षमता में सुधार की उम्मीद है।
लागू करने की चुनौतियां
हालांकि यह समझौता एक बड़ी शुरुआत है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हर सदस्य देश इसे अपने घरेलू कानूनों में कैसे शामिल करता है। अभी यह 'इन-प्रिंसिपल' मंजूरी है, इसलिए इसे प्रभावी बनाने के लिए कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं। इसके अलावा, सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक तनाव और ग्लोबल प्रोटेक्शनिज्म (Protectionism) भी इन नियमों के पालन में चुनौती पैदा कर सकते हैं।
