अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में आज सुबह तेज़ी देखी गई, जिसमें जापान का Nikkei **2.6%** और दक्षिण कोरिया का KOSPI **1.9%** चढ़ा। इस तेज़ी की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता में प्रगति की ख़बरें हैं। वहीं, ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट आई, जो भारत जैसी तेल आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत की बात है।
शांति वार्ता से बाज़ारों को मिली राहत
सोमवार को एशियाई शेयर बाज़ारों में उछाल दर्ज किया गया। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता के एक रोडमैप तैयार होने की ख़बरों ने बाज़ार को सहारा दिया। अधिकारियों का मानना है कि अगले 60 दिनों के लिए एक संभावित समझौते का खाका तैयार है, जिससे मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने की चिंता कम हुई है। इस नरमी का असर जापान के Nikkei इंडेक्स पर 2.6% और दक्षिण कोरिया के KOSPI इंडेक्स पर 1.9% की बढ़त के रूप में दिखा। MSCI एशिया-पैसेफिक इंडेक्स भी 1.0% चढ़ा, हालांकि, चीनी ब्लू-चिप स्टॉक्स में ज़्यादा हलचल नहीं दिखी।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
भारतीय बाज़ार के लिए तेल की कीमतों में गिरावट सबसे बड़ा संकेत है। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, और ज़्यादा कीमतें चालू खाते के घाटे (current account deficit) और महंगाई पर दबाव डालती हैं। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 0.4% गिरकर $80.17 प्रति बैरल पर आ गए, जो मई में देखे गए $126.41 के उच्चतम स्तर से काफी नीचे है। तेल की कीमतों में यह गिरावट पेंट, टायर और एविएशन जैसे सेक्टरों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को भी राहत दे सकती है।
फेड की ब्याज दरें और महंगाई का डर
भू-राजनीतिक तनाव कम होने के बावजूद, ग्लोबल निवेशक अमेरिकी फेडरल रिज़र्व (Fed) की मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर सतर्क हैं। बाज़ार के अनुसार, सितंबर में ब्याज दरों में 75% तक की वृद्धि की संभावना है। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें अक्सर डॉलर को मज़बूत करती हैं और भारत जैसे उभरते बाज़ारों से पूंजी के बहिर्वाह (outflows) का कारण बन सकती हैं। 2-साल के अमेरिकी ट्रेजरी नोट्स पर यील्ड 4.2276% तक पहुंच गया, जो बाज़ार की उम्मीदों को दर्शाता है। अब निवेशक गुरुवार को आने वाले अमेरिकी कोर इन्फ्लेशन (core inflation) के आंकड़ों का इंतज़ार कर रहे हैं, जिनसे मई के लिए 3.4% की वृद्धि की उम्मीद है। यह आंकड़ा फेडरल रिज़र्व के ब्याज दरों पर आक्रामक रुख को समझने में महत्वपूर्ण होगा।
डॉलर की मज़बूती और बाज़ार का मिजाज़
वैश्विक सूचकांकों ने मिले-जुले संकेतों को दर्शाया। एशियाई बाज़ारों ने जहां भू-राजनीतिक ख़बरों का स्वागत किया, वहीं अमेरिकी S&P 500 और Nasdaq फ्यूचर्स में मामूली गिरावट देखी गई, जो ब्याज दर के नज़रिए को लेकर सावधानी का संकेत देती है। करेंसी बाज़ार में, डॉलर येन के मुकाबले मज़बूत रहा, जबकि यूरो और ब्रिटिश पाउंड पर हल्का दबाव देखा गया। JPMorgan जैसे विश्लेषकों का मानना है कि हालांकि ब्याज दरों में जल्दी बढ़ोतरी का जोखिम मौजूद है, लेकिन मज़बूत लेबर मार्केट और स्थिर वृद्धि की उम्मीदों के कारण लार्ज-कैप और टेक्नोलॉजी स्टॉक्स लंबी अवधि के निवेशकों के लिए फोकस का केंद्र बने रहेंगे।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को आने वाले अमेरिकी कोर इन्फ्लेशन के आंकड़ों पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि ये फेडरल रिज़र्व के नीतिगत फैसलों को बहुत प्रभावित करेंगे। महंगाई में कोई भी अप्रत्याशित वृद्धि दर में बढ़ोतरी के डर को बढ़ा सकती है, जिससे तेल की कीमतों में नरमी से मिली राहत कम हो सकती है। इसके अलावा, अमेरिका-ईरान शांति रोडमैप पर किसी भी अपडेट और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जहाज़ों की आवाजाही में वास्तविक बदलाव वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों और आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण संकेतक होंगे।
