Young Indians Health Insurance: 'Unlimited' कवर की डिमांड बढ़ी, युवा खरीद रहे महंगे प्लान

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AuthorAditya Rao|Published at:
Young Indians Health Insurance: 'Unlimited' कवर की डिमांड बढ़ी, युवा खरीद रहे महंगे प्लान

भारत में हेल्थ इंश्योरेंस का ट्रेंड बदल रहा है। युवा पीढ़ी, खासकर मिलेनियल्स और जेन-जेड, अब 'अनलिमिटेड' या बहुत ज्यादा सम-इंश्योर्ड वाले हेल्थ प्लान्स की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। **45** साल से कम उम्र के खरीदार इस डिमांड का करीब **90%** हिस्सा हैं, जिससे इंश्योरेंस कंपनियों के प्रोडक्ट्स में बड़ा बदलाव दिख रहा है।

हेल्थ इंश्योरेंस में बड़ा बदलाव

भारत के हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। लोग अब कम कवरेज वाले पारंपरिक प्लान्स की जगह 'अनलिमिटेड' या बहुत ज्यादा सम-इंश्योर्ड वाले प्लान्स को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। पॉलिसीबाजार जैसे बड़े इंश्योरेंस प्लेटफॉर्म के आंकड़ों के मुताबिक, इन कॉम्प्रिहेंसिव प्लान्स को अपनाने का चलन FY25 में सिर्फ 0.05% से बढ़कर FY27 तक 15% से ज्यादा हो गया है। इस ट्रेंड के पीछे मुख्य वजह युवा खरीदार हैं; इन महंगे प्लान्स को खरीदने वाले लगभग 90% लोग 45 साल से कम उम्र के हैं, जिनमें 57% मिलेनियल्स और 30% से ज्यादा जेन-जेड शामिल हैं।

टियर-2 और टियर-3 शहरों का दबदबा

पहले, महंगे इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स मुख्य रूप से बड़े शहरों तक सीमित थे। लेकिन अब नए आंकड़े बताते हैं कि टियर-2 और टियर-3 शहर 'अनलिमिटेड' सम-इंश्योर्ड पॉलिसी की खरीद में दो-तिहाई हिस्सेदारी रखते हैं। खास बात यह है कि अकेले टियर-3 शहरों से 41% से ज्यादा की बिक्री हो रही है, जो बड़े मेट्रो शहरों से भी आगे निकल गए हैं। इसका मतलब है कि मेडिकल खर्चों से मजबूत फाइनेंशियल सुरक्षा की जरूरत और जागरूकता बड़े शहरों के बाहर भी तेजी से फैल रही है, जिससे इंश्योरेंस कंपनियों के लिए मार्केट का दायरा बढ़ रहा है।

कंपनियों और निवेशकों पर असर

इंश्योरेंस प्रोवाइडर्स के लिए, ज्यादा सम-इंश्योर्ड वाले प्लान्स की ओर यह बदलाव आम तौर पर हर ग्राहक से ज्यादा प्रीमियम कलेक्शन की ओर ले जाता है। अगर इंश्योरर्स इस डिमांड को सफलतापूर्वक भुना पाते हैं, तो इससे उनकी टॉप-लाइन रेवेन्यू और एवरेज रेवेन्यू पर यूजर (ARPU) में बढ़ोतरी होगी। कई खरीदार 'कंज्यूमेबल्स कवर' और 'डे-1 कवरेज' जैसी अतिरिक्त सुविधाएं भी चुन रहे हैं, जो प्रीमियम लागत को और बढ़ाती हैं। हालांकि यह रेवेन्यू ग्रोथ अच्छी है, लेकिन प्रॉफिटेबिलिटी पर इसका लॉन्ग-टर्म असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां अपने क्लेम पेआउट्स को कितनी अच्छी तरह मैनेज करती हैं।

मेडिकल इन्फ्लेशन का रिस्क

जहां एक ओर डिमांड बढ़ रही है, वहीं इंश्योरेंस कंपनियों को मेडिकल इन्फ्लेशन के लगातार रिस्क का सामना करना पड़ रहा है। इसका मतलब है कि हॉस्पिटल ट्रीटमेंट का खर्च आम महंगाई से भी तेजी से बढ़ रहा है। अगर प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च काफी बढ़ जाता है, तो इससे क्लेम भी बढ़ सकते हैं। इंश्योरर्स को अपने प्रीमियम को सावधानी से तय करना होगा ताकि क्लेम पेआउट्स से होने वाली आय से ज्यादा न हो जाएं। निवेशक आमतौर पर 'लॉस रेश्यो' पर नजर रखते हैं - यह एक ऐसा मेट्रिक है जो बताता है कि कलेक्ट किए गए प्रीमियम का कितना प्रतिशत क्लेम के रूप में चुकाया गया है - यह देखने के लिए कि क्या कोई इंश्योरेंस कंपनी बढ़ती लागतों को मैनेज करते हुए स्वस्थ मार्जिन बनाए रख रही है।

निवेशकों के लिए ट्रैक करने योग्य बातें

इस सेक्टर की कंपनियों, जैसे लाइफ और हेल्थ इंश्योरर्स या पॉलिसीबाजार (PB Fintech) जैसे इंश्योरेंस डिस्ट्रिब्यूटर्स का विश्लेषण करने वाले निवेशकों को कई बातों पर ध्यान देना चाहिए। पहला, जैसे-जैसे कंपनियां छोटे शहरों में विस्तार कर रही हैं, स्वस्थ अंडरराइटिंग मार्जिन बनाए रखना। दूसरा, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) के बदलते नियमों का असर, जो अक्सर प्रोडक्ट फीचर्स और प्राइसिंग पर गाइडलाइन्स तय करती है। अंत में, इस डिमांड ट्रेंड की स्थिरता महत्वपूर्ण होगी; जो इंश्योरर्स टियर-3 बाजारों में तेजी से ग्राहक अधिग्रहण को अनुशासित क्लेम मैनेजमेंट के साथ संतुलित कर सकते हैं, वे लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए बेहतर स्थिति में हो सकते हैं।

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