साल **2021** के टैक्स नियमों के तहत, यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (ULIP) जिन पर सालाना प्रीमियम **₹2.5 लाख** से ज़्यादा है, वे टैक्स-फ्री स्टेटस खो देंगे। इन पॉलिसियों के मैच्योरिटी अमाउंट पर अब लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) की तरह टैक्स लगेगा।
कई सालों तक, यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (ULIPs) भारतीय निवेशकों के लिए एक खास फाइनेंशियल प्रोडक्ट रहे हैं। ये इंश्योरेंस कवरेज के साथ-साथ मार्केट-लिंक्ड निवेश का मौका देते थे। इसका सबसे बड़ा आकर्षण था इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 10(10D) के तहत मैच्योरिटी पर मिलने वाला टैक्स-फ्री अमाउंट, बशर्ते पॉलिसी 5 साल की लॉक-इन अवधि के बाद हो। लेकिन, फाइनेंस एक्ट 2021 के बाद से यह फायदा अब सबको नहीं मिलेगा।
₹2.5 लाख सालाना प्रीमियम लिमिट का असर
यह बड़ा बदलाव 1 फरवरी, 2021 को या उसके बाद जारी की गई पॉलिसियों पर लागू होता है। अगर एक या एक से ज़्यादा ऐसी पॉलिसियों पर कुल सालाना प्रीमियम ₹2.5 लाख से ज़्यादा है, तो मैच्योरिटी या सरेंडर पर मिलने वाला अमाउंट अब ऑटोमैटिकली टैक्स-फ्री नहीं होगा। ध्यान दें कि यह पूरे पेआउट पर टैक्स नहीं है, बल्कि केवल निवेश पर हुए कैपिटल गेन्स पर टैक्स लगेगा। इन गेन्स को लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स माना जाएगा और इन पर एक कंसेशनल रेट से टैक्स लगेगा, जो अक्सर इंडिविजुअल के रेगुलर इनकम स्लैब से कम होता है।
टैक्स बेनिफिट में बदलाव और रिपोर्टिंग
गेंस पर लगने वाले टैक्स के अलावा, निवेशकों को अपने पुराने टैक्स फाइलिंग में संभावित एडजस्टमेंट के लिए भी तैयार रहना चाहिए। अगर किसी निवेशक ने इन हाई-प्रीमियम ULIPs पर भरे गए प्रीमियम के लिए सेक्शन 80C के तहत टैक्स डिडक्शन का फायदा उठाया था, तो अब नए नियमों के तहत टैक्स की वापसी (clawback) का मैकेनिज्म है। पॉलिसी सरेंडर या मैच्योर होने पर, पहले क्लेम किए गए डिडक्शन को उस साल के टैक्सेबल इनकम में वापस जोड़ा जा सकता है। इससे असल में प्रीमियम भरने के सालों के दौरान मिला टैक्स बेनिफिट रिवर्स हो जाता है। इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में इन ट्रांज़ैक्शन्स की सही रिपोर्टिंग कंप्लायंस के लिए बहुत ज़रूरी है और यह पॉलिसीहोल्डर्स को टैक्स अथॉरिटीज की पूछताछ से बचने में मदद करता है।
ULIP के कामकाज और निवेशकों के लिए ज़रूरी बातें
ULIPs आज भी इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट का कॉम्बीनेशन वाले कॉम्प्लेक्स प्रोडक्ट्स हैं, जो अक्सर इक्विटी, डेट या हाइब्रिड फंड्स में एक्सपोजर देते हैं। क्योंकि अब टैक्स ट्रीटमेंट कुल सालाना प्रीमियम पर निर्भर करता है, इसलिए कई पॉलिसियां रखने वाले निवेशकों को अपने कुल प्रीमियम आउटगो की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए। ULIP इन्वेस्टमेंट का फाइनल फाइनेंशियल आउटकम अब मार्केट परफॉरमेंस और इन स्पेसिफिक टैक्स प्रोविज़न्स के तालमेल से तय होगा। निवेशकों को अपने कुल सालाना प्रीमियम कंट्रीब्यूशन को ट्रैक करना चाहिए और अपने टैक्स स्टेटमेंट्स से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फरवरी 2021 के बाद जारी पॉलिसियों से हुए सभी गेन्स को मौजूदा टैक्स नियमों के अनुसार सही ढंग से रिपोर्ट किया गया है। प्रीमियम पेमेंट्स और मैच्योरिटी वैल्यूज़ के डॉक्यूमेंट्स को संभाल कर रखना, सरेंडर या मैच्योरिटी के साल में टैक्सेबल कैपिटल गेन पोर्शन की सही गणना के लिए महत्वपूर्ण होगा।
