Standalone health insurers ने IRDAI से Expense of Management (EoM) की गणना में बदलाव की मांग की है। कंपनियों का कहना है कि अनिवार्य बिजनेस लाइन्स को शामिल करने से उनके लिए **25%** का खर्च कैप पूरा करना मुश्किल हो रहा है।
बीमा कंपनियों के नियामक IRDAI के साथ हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर की इन दिनों अहम चर्चा चल रही है। मुद्दा है 'Expense of Management' (EoM) लिमिट, जो यह तय करती है कि एक कंपनी अपने संचालन, कमीशन और एडमिनिस्ट्रेटिव खर्चों पर कितना पैसा खर्च कर सकती है। रेगुलेटर ने आने वाले 2 सालों में इस खर्च को 25% और 5 सालों में 20% तक सीमित करने का प्रस्ताव रखा है।
क्यों परेशान हैं हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां?
Star Health जैसी कंपनियां मुख्य रूप से रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस पर केंद्रित हैं। वहीं, जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के पास मोटर, क्रॉप और प्रॉपर्टी जैसे कई तरह के प्रोडक्ट्स होते हैं। हेल्थ इंश्योरर्स का तर्क है कि अगर मोटर थर्ड-पार्टी या सरकारी योजनाओं जैसे अनिवार्य बिजनेस को भी इस खर्च की कैलकुलेशन में जोड़ा गया, तो उनके लिए नियमों का पालन करना नामुमकिन हो जाएगा।
रेगुलेटरी बदलाव का गणित
इंडस्ट्री चाहती है कि अनिवार्य और कम कमीशन वाले प्रोडक्ट्स को कैलकुलेशन के बेस से बाहर रखा जाए, ताकि रिटेल हेल्थ पॉलिसीज की सही तस्वीर सामने आ सके। इसके अलावा, रेगुलेटर अब कैलकुलेशन का तरीका भी बदलने की तैयारी में है। अब यह Gross Written Premium (GWP) की जगह Gross Direct Premium Income (GDPI) के आधार पर होगा, जिससे री-इंश्योरेंस प्रीमियम बाहर हो जाएंगे।
निवेशकों के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि इन खर्चों की सीमाओं का सीधा असर कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन और लंबी अवधि की रणनीति पर पड़ेगा। अब देखना यह है कि IRDAI इन सिफारिशों को किस हद तक स्वीकार करता है, क्योंकि इसी पर इन कंपनियों का भविष्य और मुनाफा निर्भर करेगा।
