भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और अन्य बीमा कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती सामने आई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में, पॉलिसी सरेंडर और जल्दी निकासी के भुगतान कुल भुगतानों का **38.3%** रहे, जो कि दो साल से लगातार मैच्योरिटी से मिले भुगतान से ज़्यादा है।
क्यों बढ़ रहे हैं सरेंडर?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की लेटेस्ट फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार, यह ट्रेंड लगातार दूसरे साल देखने को मिला है। इससे पता चलता है कि पॉलिसी होल्डर्स बीमा कंपनियों से खुश नहीं हैं और अपनी पॉलिसी को समय से पहले ही सरेंडर कर रहे हैं। इस वजह से कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें जल्दी भुगतान करना पड़ रहा है।
मुनाफे पर सीधा असर
बीमा कंपनियों का पूरा बिजनेस मॉडल प्रीमियम से जमा हुए पैसे को लंबे समय तक निवेश करके मुनाफा कमाना है। जब पॉलिसी होल्डर समय से पहले ही पैसे निकाल लेते हैं, तो कंपनियों को अपने लंबे समय के निवेश को तोड़कर जल्दी भुगतान करना पड़ता है। इसके लिए उन्हें कम ब्याज वाले लिक्विड निवेशों में ज्यादा पैसा रखना पड़ता है, जिससे उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बनता है।
FY21 में जहां इंडस्ट्री का कुल भुगतान ₹4 लाख करोड़ था, वहीं FY26 में यह बढ़कर ₹7.3 लाख करोड़ हो गया। लेकिन, बीमा पैठ (Insurance Penetration) 3.7% पर ही अटकी हुई है, जिससे यह साफ है कि कंपनियां पुराने ग्राहकों को बनाए रखने और नए ग्राहक जोड़ने में संघर्ष कर रही हैं।
बढ़ती कमीशन और गलत बिक्री का खेल
इस बढ़ती सरेंडर रेशियो की एक बड़ी वजह आक्रामक सेल्स कल्चर और प्रोडक्ट्स की गलत बिक्री (Mis-selling) बताई जा रही है। RBI की रिपोर्ट बताती है कि प्राइवेट लाइफ इंश्योरर्स का कमीशन खर्च FY22 से दोगुना हो गया है। FY25 में अकेले कमीशन पर ₹60,800 करोड़ खर्च हुए, जो 18% की बढ़ोतरी है। वहीं, नए प्रीमियम की ग्रोथ सिर्फ 6.7% रही।
कमीशन का स्ट्रक्चर ऐसा है कि एजेंट नए सेल्स पर ज्यादा फोकस करते हैं, बजाय इसके कि प्रोडक्ट ग्राहक के लिए कितना फायदेमंद है। यह बढ़ता खर्च और धीमी प्रीमियम ग्रोथ इंश्योरेंस कंपनियों के मुनाफे के लिए एक बड़ा चिंता का विषय है।
नए रेगुलेटरी नियम
इन दिक्कतों को दूर करने के लिए, भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (Irdai) ने नियमों में बदलाव किए हैं। अब जल्दी पॉलिसी लैप्स होने का खर्चा सीधे बीमा कंपनियों को उठाना होगा, ताकि वे क्वालिटी पर ध्यान दें।
इसके अलावा, RBI ने 1 जनवरी 2027 से कड़े एंटी-मिससेलिंग नियम लागू करने की घोषणा की है। इसके तहत, बैंकों और बीमा कंपनियों को हर प्रोडक्ट बेचने से पहले ग्राहक की स्पष्ट, रिकॉर्ड की गई सहमति लेनी होगी। साथ ही, लोन के साथ बीमा को बंडल करने पर भी रोक लगा दी गई है।
अब देखना यह होगा कि ये नए नियम आने वाले समय में सरेंडर रेशियो को कम कर पाते हैं या नहीं और ग्राहक कितने समय तक अपनी पॉलिसी बनाए रखते हैं। बीमा कंपनियों का टिकाऊ, जरूरत-आधारित बिक्री की ओर बढ़ना उनके भविष्य के लिए अहम होगा।
