भारतीय नॉन-लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां 4 साल बाद मोटर थर्ड-पार्टी (TP) प्रीमियम बढ़ाने की मांग कर रही हैं। लगातार बढ़ रहे क्लेम (claim) और सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के कारण कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है, जिससे उनके मुनाफे पर बुरा असर पड़ रहा है।
Detailed Coverage
4 साल बाद प्रीमियम बढ़ाने की उठी मांग
भारत में नॉन-लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां अब मोटर थर्ड-पार्टी (TP) प्रीमियम रेट्स में बढ़ोतरी की मांग कर रही हैं। यह पिछले 4 सालों में पहली बार हो रहा है जब प्रीमियम में कोई बदलाव की बात हो रही है। दरअसल, मोटर इंश्योरेंस का यह अनिवार्य हिस्सा लगातार बढ़ते अंडरराइटिंग लॉस (underwriting losses) और क्लेम की देनदारियों से जूझ रहा है। कंपनियों का कहना है कि इस प्राइस एडजस्टमेंट (price adjustment) से इस सेगमेंट की वित्तीय स्थिति को फिर से मजबूत किया जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बड़ा असर
बीमा कंपनियों पर वित्तीय दबाव तब और बढ़ गया जब 11 जून, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने 'लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर' (Loss of Domestic Care) के तहत घरेलू महिलाओं को भी हर्जाना देने का आदेश दिया है। इसके लिए, वे हर महीने ₹30,000 की बेस इनकम को महंगाई दर के हिसाब से एडजस्ट करके क्लेम की मांग कर सकती हैं।
ICICI Lombard के MD और CEO, संजीव मंत्री (Sanjeev Mantri) का कहना है कि इस फैसले से मोटर थर्ड-पार्टी लॉस रेशियो (loss ratio) में करीब 12% से 15% तक का इजाफा हो सकता है। इसी को देखते हुए ICICI Lombard ने अपने क्लेम रिजर्व (claim reserves) में ₹165 करोड़ की बढ़ोतरी की है। इसी वजह से कंपनी के जून तिमाही के नेट प्रॉफिट में 46% की भारी गिरावट आई थी।
इंश्योरेंस कंपनियों पर वित्तीय बोझ
फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के अनुसार, मोटर सेगमेंट से ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा का प्रीमियम इकट्ठा हुआ, जिसमें से अकेले थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस का हिस्सा ₹64,227 करोड़ था। इतने बड़े सेगमेंट में भी अंडरराइटिंग लॉस एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
New India Assurance ने FY27 की पहली तिमाही में अपने मोटर सेगमेंट में ₹1,297.17 करोड़ का बड़ा अंडरराइटिंग लॉस दर्ज किया, जो पिछले साल की इसी अवधि के ₹824.58 करोड़ के लॉस से कहीं ज्यादा है। इस खराब प्रदर्शन के चलते कंपनी को तिमाही में ₹243.94 करोड़ का कंसोलिडेटेड नेट लॉस (net loss) हुआ, जबकि पिछले साल इसी अवधि में ₹392.40 करोड़ का मुनाफा हुआ था।
इंडस्ट्री का जवाब और आगे की राह
खबरों के मुताबिक, जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (General Insurance Council) इस नए सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर पर कानूनी समीक्षा (legal review) की मांग कर रही है। वहीं, प्रीमियम बढ़ाने की मांग को 'प्रीमियम एडिक्वेसी' (premium adequacy) यानी यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी बताया जा रहा है कि इकट्ठा किया गया पैसा क्लेम और खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो।
क्योंकि थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस एक अनिवार्य प्रोडक्ट है, इसलिए इसकी कीमत काफी संवेदनशील होती है और इसे रेगुलेट (regulate) किया जाता है। ऐसे में, इंडस्ट्री की तरफ से प्रीमियम रेट्स में बदलाव का अनुरोध एक महत्वपूर्ण घटना है। इन्वेस्टर्स (investors) जनरल इंश्योरेंस काउंसिल की इस समीक्षा और आने वाली तिमाहियों में इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) से किसी भी संभावित प्रीमियम रेट एडजस्टमेंट (premium rate adjustment) पर नजर रखेंगे।
