Niva Bupa CEO की चिंता: कॉर्पोरेट पॉलिसी खा रही हैं रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस का विकास!

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AuthorMehul Desai|Published at:
Niva Bupa CEO की चिंता: कॉर्पोरेट पॉलिसी खा रही हैं रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस का विकास!
Overview

Niva Bupa Health Insurance के CEO, कृष्णन रामाचंद्रन, का कहना है कि घाटे वाली कॉर्पोरेट ग्रुप पॉलिसियों को रिटेल ग्राहकों के प्रीमियम से सब्सिडी दी जा रही है, जो रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने कहा कि असली ग्रोथ के लिए इंश्योरेंस कंपनियों को डिस्ट्रीब्यूशन और ग्राहक अधिग्रहण पर भारी निवेश करना होगा।

कॉर्पोरेट सब्सिडी का बोझ

Niva Bupa Health Insurance के CEO कृष्णन रामाचंद्रन ने इस बात पर जोर दिया है कि घाटे वाली कॉर्पोरेट ग्रुप पॉलिसियों को दूसरी पॉलिसियों से सब्सिडी मिलना, रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस के बाजार में असली पैठ बनाने में सबसे बड़ी रुकावट है। उनका कहना है कि कई ग्रुप पॉलिसियों का क्लेम रेश्यो (100% से ऊपर) चला जाता है, जिसका बोझ रिटेल ग्राहकों से वसूले गए प्रीमियम और टैक्सपेयर्स के पैसों से उठाया जाता है। इस असंतुलन को ठीक करने के लिए, इंश्योरेंस कंपनियों को रिटेल सेगमेंट में ज्यादा ध्यान और निवेश देना होगा। Niva Bupa खुद इस रिटेल-केंद्रित बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगभग ₹2,800 करोड़ का कैपिटल निवेश कर चुकी है।

ग्रोथ के लिए जरूरी निवेश

रामाचंद्रन के मुताबिक, हेल्थ इंश्योरेंस का कवरेज बढ़ाने के लिए डिस्ट्रीब्यूशन चैनल और नए ग्राहक जोड़ने पर लगातार शुरुआती निवेश की जरूरत है। भले ही शुरुआती सालों में क्लेम कम दिखें, लेकिन लंबे समय में ग्राहक बनाए रखने से बड़ा फायदा होता है। दुनिया भर में 75-80% के मेडिकल लॉस रेश्यो (MLR) को उचित माना जाता है। जो कंपनियाँ नए ग्राहकों को तेजी से जोड़ती हैं, उनके शुरुआती क्लेम अक्सर कम होते हैं, जिससे उनका औसत MLR कम दिखता है। भारत जैसे रिटेल बाजार में, जहाँ ग्राहकों को जागरूक करना और उनकी जरूरत के हिसाब से सलाह देना महत्वपूर्ण है, यह निवेश बेहद जरूरी है।

GST का असर और बाजार का प्रदर्शन

कंपनी ने अक्टूबर में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) में कटौती के बाद सेल्स में तेजी देखी है। अक्टूबर से शुरू हुई यह रफ्तार दिसंबर में और तेज हुई और जनवरी तक जारी रही। इन महीनों की अच्छी परफॉरमेंस की बदौलत, कंपनी ने तीसरी तिमाही (Q3) में वॉल्यूम ग्रोथ 29% और वैल्यू ग्रोथ 15% दर्ज की, जो बताता है कि पॉलिसी के प्रीमियम साइज में बढ़ोतरी हुई है। GST के कारण दवाओं की कीमतों में जो बचत हुई है, उससे इंश्योरेंस कंपनियों को इनपुट सर्विसेज पर लगने वाले टैक्स का बोझ कम करने में मदद मिली है। हालांकि, कमीशन पर लगने वाला GST का पूरा बोझ एजेंट्स ही उठा रहे हैं।

सेक्टर का भविष्य और बड़ी चुनौतियाँ

बाजार में चल रहे समायोजनों के बावजूद, भारतीय हेल्थ इंश्योरेंस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी समस्या इसका बहुत कम पेनिट्रेशन रेट है। रामाचंद्रन ने कहा कि हेल्थ इंश्योरेंस एक जरूरी चीज है, जो लोगों को गरीबी से बचाने में सीधे तौर पर मदद करती है। इसका दीर्घकालिक समाधान यह है कि जो लोग इसे खरीद सकते हैं, उनके लिए रिटेल कवरेज बढ़ाया जाए, साथ ही कमजोर वर्गों के लिए सब्सिडी की व्यवस्था हो। Niva Bupa को उम्मीद है कि बेहतर अंडरराइटिंग (बीमा स्वीकार करने की प्रक्रिया) और एडवांस क्लेम मैनेजमेंट के जरिए मार्जिन में सुधार होगा। इसके लिए कंपनी टेक्नोलॉजी और AI में लगातार निवेश कर रही है। इंडस्ट्री के सामने यह बड़ी चुनौती है कि वह मौजूदा ऑपरेशनल खर्चों को मैनेज करते हुए करोड़ों ऐसे लोगों तक इंश्योरेंस पहुंचाए जो अभी भी इससे वंचित हैं।

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