Navi General Insurance के CEO, Vaibhav Goyal का मानना है कि भारत के इंश्योरेंस सेक्टर में डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से बीमा कवरेज के अंतर को पाटना संभव है। फिलहाल, भारत की बीमा पैठ GDP के सिर्फ 1% पर है। कंपनी छोटे शहरों में ग्राहकों तक पहुंचने के लिए सरल प्रोडक्ट्स पर फोकस कर रही है।
डिजिटल फर्स्ट अप्रोच से बढ़ेगा बीमा कवरेज
Navi General Insurance के CEO, Vaibhav Goyal ने कहा है कि भारत के इंश्योरेंस सेक्टर को अपनी पैठ (penetration) बढ़ाने के लिए डिजिटल-फर्स्ट (digital-first) अप्रोच अपनाना ही होगा। आपको बता दें कि भारत में जनरल इंश्योरेंस की पैठ मौजूदा समय में GDP के करीब 1% पर है, जो दुनिया के औसत 4% से काफी कम है। यह एक बड़ी चुनौती है, खासकर तब जब सरकार ने 2047 तक 'सबके लिए बीमा' का लक्ष्य रखा है।
Navi का डिजिटल प्लान
Navi General Insurance खुद को एक डिजिटल-नेटिव (digital-native) कंपनी के तौर पर स्थापित कर रही है। इसी साल कंपनी ने कार और टू-व्हीलर के लिए जीरो-कमीशन (zero-commission) मोटर इंश्योरेंस प्रोडक्ट लॉन्च किया था। पारंपरिक कमीशन स्ट्रक्चर को हटाकर, कंपनी का मकसद ग्राहकों के लिए लागत कम करना और खरीदने की प्रक्रिया को आसान बनाना है। यह मॉडल खास तौर पर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की मांग को टारगेट करने के लिए बनाया गया है, जहां पारंपरिक फिजिकल ब्रांच नेटवर्क अक्सर हाई ऑपरेशनल कॉस्ट से जूझते हैं।
इंडस्ट्री के सामने चुनौतियां
डिजिटल विस्तार के बावजूद, जनरल इंश्योरेंस सेक्टर को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यह सेक्टर काफी कॉम्पिटिटिव (competitive) है, जिसमें मार्केट में गहरी पकड़ रखने वाली पब्लिक और प्राइवेट इंश्योरर्स मौजूद हैं। डिजिटल बिक्री बढ़ाने के लिए सिर्फ एक ऐप से कहीं ज्यादा, ग्राहकों का गहरा भरोसा जीतना जरूरी है। भारत में, इंश्योरेंस को अक्सर एक कॉम्प्लेक्स प्रोडक्ट माना जाता है, और कई ग्राहक अभी भी पर्सनल गाइडेंस के लिए एजेंट्स पर निर्भर करते हैं, खासकर क्लेम (claim) के समय। इस व्यवहार को पूरी तरह से डिजिटल फॉर्मेट में बदलना सभी टेक-फोक्स्ड इंश्योरर्स के लिए एक चुनौती बनी हुई है।
कैपिटल और रेगुलेशन
इसके अलावा, इंश्योरेंस का बिजनेस कैपिटल-इंटेंसिव (capital-intensive) होता है। सॉल्वेंसी मार्जिन (solvency margin) – यानी क्लेम चुकाने के लिए आवश्यक फाइनेंशियल कुशन – को बनाए रखने के लिए, इंश्योरर्स को ग्रोथ के साथ-साथ पर्याप्त कैपिटल सुनिश्चित करना होता है। रेगुलेटरी (Regulatory) आवश्यकताएं भी विकसित हो रही हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि डिजिटल प्रोडक्ट्स पारदर्शी हों और क्लेम प्रोसेस को निष्पक्ष तरीके से संभाला जाए। आक्रामक विस्तार को स्ट्रिक्ट अंडरराइटिंग डिसिप्लिन (underwriting discipline) के साथ संतुलित करना लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी (sustainability) के लिए महत्वपूर्ण है।
ध्यान देने योग्य बातें
निवेशकों को यह ध्यान देना चाहिए कि Navi General Insurance, प्राइवेट Navi ग्रुप का हिस्सा है। भारत की कई स्थापित इंश्योरेंस कंपनियों के विपरीत, यह NSE या BSE पर लिस्टेड नहीं है। नाम को लेकर कभी-कभी कन्फ्यूजन US-बेस्ड Navient Corporation (NAVI) के कारण भी होता है, जो US स्टॉक एक्सचेंजों पर लिस्टेड एक अलग फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनी है। हालांकि Navi Technologies के ग्रुप एंटिटीज (entities) नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (non-convertible debentures) जैसे डेट इंस्ट्रूमेंट्स (debt instruments) जारी करते हैं, लेकिन इंश्योरेंस आर्म खुद भारतीय स्टॉक मार्केट में ट्रेड नहीं करता है। सेक्टर के लिए अगला महत्वपूर्ण डेवलपमेंट यह देखना होगा कि कंपनियां डिजिटल जागरूकता को वास्तविक, लॉन्ग-टर्म पॉलिसी रिटेंशन (policy retention) में कितनी कुशलता से बदल पाती हैं, न कि केवल शुरुआती साइन-अप्स में।
