Monsoon Health Insurance: इन बीमारियों में क्लेम अटक न जाए, जानें खास बातें!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Monsoon Health Insurance: इन बीमारियों में क्लेम अटक न जाए, जानें खास बातें!

मानसून के आते ही डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियाँ तेज़ी से फैलने लगती हैं। ऐसे में, जानना ज़रूरी है कि आपका हेल्थ इंश्योरेंस इन बीमारियों में हॉस्पिटलाइजेशन (24 घंटे से ज़्यादा) का खर्चा देगा या नहीं। लेकिन OPD का खर्च और वेटिंग पीरियड जैसी चीज़ें पॉलिसी होल्डर्स को चौंका सकती हैं। इसलिए, आज ही अपने कवरेज की लिमिट्स और नेटवर्क हॉस्पिटल्स की लिस्ट ज़रूर चेक कर लें।

Detailed Coverage

इनपेशेंट (भर्ती) बनाम आउटपेशेंट (बाहरी मरीज़) कवरेज को समझें

ज़्यादातर हेल्थ इंश्योरेंस प्लान्स इनपेशेंट हॉस्पिटलाइजेशन के लिए बनाए जाते हैं। इसका मतलब है कि क्लेम के लिए आपको कम से कम 24 घंटे लगातार अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा। इसमें रूम रेंट, नर्सिंग फीस, दवाइयां और ICU चार्जेस शामिल होते हैं। लेकिन, एक बड़ी कमी जो कई पॉलिसी होल्डर्स को दिखती है, वो है आउटपेशेंट डिपार्टमेंट (OPD) का कवरेज। अगर आप बिना भर्ती हुए घर पर इलाज कराते हैं या डॉक्टर से सलाह और टेस्ट के लिए क्लिनिक जाते हैं, तो यह खर्चा आमतौर पर कवर नहीं होता, जब तक कि आपकी पॉलिसी में खास OPD राइडर या बेनिफिट न हो। इसके बिना, आपको दवाओं और डॉक्टर की फीस का भुगतान अपनी जेब से करना पड़ सकता है।

वेटिंग पीरियड का असर

एक आम गलती यह है कि लोग बारिश का मौसम शुरू होने या लक्षण दिखने के बाद ही इंश्योरेंस खरीदते हैं। लगभग सभी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों में नॉन-एक्सीडेंटल बीमारियों के लिए एक शुरुआती वेटिंग पीरियड होता है, जो अक्सर 30 दिन का होता है। अगर आप बरसात के मौसम में पॉलिसी खरीदते हैं, तो यह वेटिंग पीरियड खत्म होने तक आप इन बीमारियों से सुरक्षित नहीं होंगे। इसके अलावा, खरीदने के समय बताई गई किसी भी पुरानी बीमारी (Pre-existing conditions) के लिए भी अलग वेटिंग पीरियड हो सकता है, जिसके बाद ही वह कवरेज के लिए योग्य होगी।

कैशलेस सुविधा और नेटवर्क हॉस्पिटल्स

बीमारी के दौरान पैसों के फ्लो को मैनेज करने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप अपने इंश्योरर के नेटवर्क वाले हॉस्पिटल में इलाज कराएं। नेटवर्क हॉस्पिटल्स में कैशलेस ट्रीटमेंट की सुविधा मिलती है, जिससे आपको बड़े मेडिकल बिलों का भुगतान पहले नहीं करना पड़ता और रीइंबर्समेंट का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। अगर आप नेटवर्क से बाहर के हॉस्पिटल में जाते हैं, तो आपको सारे खर्चे खुद उठाने होंगे और फिर बिल सबमिट करके रीइंबर्समेंट लेना होगा, जिसमें समय लग सकता है और बारीकी से जांच होती है। किसी भी इमरजेंसी से पहले, अपने नज़दीकी नेटवर्क हॉस्पिटल्स की लिस्ट और अपने TPA (Third Party Administrator) का इमरजेंसी कॉन्टैक्ट नंबर तैयार रखें।

पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करना

हाल के सालों में मेडिकल इन्फ्लेशन (Medical Inflation) के कारण इलाज का खर्चा काफी बढ़ गया है। उदाहरण के लिए, भारत के किसी बड़े मेट्रो शहर में डेंगू के मामूली मामले में कुछ दिनों के हॉस्पिटलाइजेशन का खर्च आसानी से ₹80,000 से ₹1.5 लाख तक जा सकता है। ICU की ज़रूरत पड़ने पर, यह खर्चा तेज़ी से ₹3 लाख से ₹5 लाख को पार कर सकता है। फाइनेंशियल प्लानर्स अक्सर एक व्यक्ति के लिए कम से कम ₹10 लाख के बेस कवरेज का सुझाव देते हैं, जबकि फैमिली फ्लोटर पॉलिसी लेने वाले परिवारों को ज़्यादा लिमिट पर विचार करना चाहिए।

दावों (Claims) में देरी से बचने के लिए, सभी ज़रूरी दस्तावेज़ जैसे डॉक्टर की प्रिस्क्रिप्शन, लैब रिपोर्ट्स, एडमिशन और डिस्चार्ज समरी, और ओरिजिनल इनवॉइस का एक फाइल बनाकर रखें। गलतियां या अधूरे कागज़ात क्लेम रिजेक्ट होने के सबसे आम कारण हैं। इसके अलावा, कुछ लोग सप्लीमेंट्री फिक्स्ड-बेनिफिट पॉलिसीज़ भी खरीदते हैं जो खास वेक्टर-बोर्न बीमारियों के निदान पर एकमुश्त राशि का भुगतान करती हैं। ये डायग्नोस्टिक टेस्ट या आय के नुकसान जैसे अतिरिक्त खर्चों को कवर करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन इन्हें आपकी मुख्य कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के सपोर्ट के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए, न कि उसके विकल्प के तौर पर।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.