Insurance Sector: IRDAI के नए नियमों से बदली कंपनियों की रणनीति, डिजिटल बदलाव की ओर तेजी से बढ़े Life Insurers

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AuthorAditya Rao|Published at:
Insurance Sector: IRDAI के नए नियमों से बदली कंपनियों की रणनीति, डिजिटल बदलाव की ओर तेजी से बढ़े Life Insurers

Private life insurers ने **1 जनवरी, 2027** से प्रभावी होने वाले IRDAI के नए डिस्ट्रीब्यूशन नियमों को पूरा करने के लिए अपनी डिजिटल रफ्तार बढ़ा दी है। पॉलिसी-लेवल ट्रेसेबिलिटी के रेगुलेटर के इस आदेश का मकसद बीमा बिक्री में पारदर्शिता लाना है।

भारत की प्रमुख प्राइवेट लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां अपनी डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रही हैं ताकि Insurance Regulatory and Development Authority of India (IRDAI) के सख्त नियमों का पालन किया जा सके। 1 जनवरी, 2027 से लागू होने वाले 'इंश्योरेंस इंटरमीडियरीज (अमेंडमेंट) रेगुलेशंस' के तहत अब हर पॉलिसी के स्तर पर 'ट्रेसेबिलिटी' अनिवार्य होगी। इसका मतलब है कि अब बीमा बिक्री में जवाबदेही और बढ़ेगी।

डिजिटल ऑपरेशंस की ओर कदम

बड़ी इंश्योरेंस कंपनियां पहले ही अपने कामकाज को डिजिटल बना चुकी हैं ताकि कागजी कार्रवाई कम हो। उदाहरण के लिए, ICICI Prudential Life Insurance ने फाइनेंशियल ईयर 2026 में 99% से अधिक बिजनेस एप्लीकेशन डिजिटल माध्यम से प्रोसेस कीं। कंपनी ने Q1 फाइनेंशियल ईयर 2027 में 2.7 करोड़ डिजिटल इंटरैक्शन दर्ज किए और 54% सेविंग्स पॉलिसी उसी दिन जारी कर दी गईं।

इसी तरह, SBI Life Insurance ने फाइनेंशियल ईयर 2026 में 99.7% व्यक्तिगत प्रस्तावों को डिजिटल रूप से प्रोसेस किया और 57% पॉलिसियों के लिए ऑटोमेटेड अंडरराइटिंग का इस्तेमाल किया। वहीं HDFC Life का 'प्रोजेक्ट इंस्पायर' (Project INSPIRE) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए पॉलिसी जारी करने और क्लेम सेटलमेंट को तेज करने पर जोर दे रहा है।

रेगुलेटरी अनुपालन का दबाव

नए नियमों के अनुसार, हर पॉलिसी डॉक्यूमेंट पर उस व्यक्ति का यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर होना अनिवार्य होगा जो उसे बेच रहा है या सर्विस दे रहा है। यह ब्रोकर, कॉर्पोरेट एजेंट और वेब एग्रीगेटर, सभी पर लागू होगा। निवेशकों के लिए देखने वाली बात यह है कि क्या इन कंप्लायंस नियमों के कारण कंपनियों के टेक्नोलॉजी खर्च में भारी बढ़ोतरी होगी।

भविष्य की राह

IRDAI अब 'बीमा सुगम' (Bima Sugam) डिजिटल मार्केटप्लेस को भी आगे बढ़ा रहा है। इसके अलावा, रेगुलेटर कमीशन स्ट्रक्चर की समीक्षा कर रहा है ताकि इसे सर्विस क्वालिटी से जोड़ा जा सके। आने वाली तिमाहियों में निवेशकों को इन कंपनियों के एक्सपेंस रेशियो पर नजर रखनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि क्या ऑटोमेशन से होने वाली बचत इन नए कंप्लायंस खर्चों को कवर कर पाएगी या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.