लाइफ इंश्योरेंस पर बड़ा झटका: 5 साल बाद 22-59% ही पॉलिसी हो रहीं रिन्यू

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
लाइफ इंश्योरेंस पर बड़ा झटका: 5 साल बाद 22-59% ही पॉलिसी हो रहीं रिन्यू

नए वित्तीय वर्ष 2024-25 के सरकारी आंकड़ों ने लाइफ इंश्योरेंस सेक्टर में चिंताजनक रुझान दिखाया है। पांचवें साल तक पहुंचते-पहुंचते लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के रिन्यूअल (renewal) में भारी गिरावट देखी जा रही है। जहां शुरुआत में ज्यादातर पॉलिसी एक्टिव रहती हैं, वहीं समय के साथ इन्हें बनाए रखने की दर में भारी कमी आई है।

क्या हैं नए आंकड़े?

वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारतीय लाइफ इंश्योरेंस सेक्टर में एक गंभीर समस्या सामने आई है, जहाँ बड़ी संख्या में पॉलिसी का नवीनीकरण (renewal) नहीं हो रहा है। जहां पहले साल में इंश्योरेंस कंपनियों को पॉलिसीधारकों से अच्छी संख्या में प्लान जारी रखने के संकेत मिलते हैं (लगभग 60% से 83% तक), वहीं पांचवें साल तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा घटकर केवल 22% से 59% रह जाता है। यह गिरावट दर्शाती है कि ग्राहकों का एक बड़ा हिस्सा अपनी लाइफ कवर को जारी नहीं रखता, और अक्सर वे उन फायदों को खो देते हैं जिनकी उन्होंने शुरुआत में तलाश की थी।

रेगुलेटर की बढ़ी चिंता

भारतीय इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (IRDAI) इन रिन्यूअल रेट्स पर बारीकी से नजर रख रही है, खासकर 13 महीने और 61 महीने के बाद। रेगुलेटर ने इंश्योरेंस फर्मों को लंबे समय तक पॉलिसी बनाए रखने को प्राथमिकता देने और गलत तरीके से पॉलिसी बेचने (mis-selling) को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। मिस-सेलिंग, यानी ग्राहकों की वास्तविक वित्तीय जरूरतों या प्रीमियम का भुगतान करने की उनकी दीर्घकालिक क्षमता पर विचार किए बिना बेची जाने वाली पॉलिसियां, अक्सर पॉलिसी जल्दी बंद होने का एक प्रमुख कारण मानी जाती हैं।

देरी के पीछे के कारण

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि इन लैप्स (lapses) के पीछे कई कारण हैं। बेची गई प्रोडक्ट की उपयुक्तता के अलावा, परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव और पॉलिसीधारक की आर्थिक स्थिति में बदलाव भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब प्रीमियम देना मुश्किल हो जाता है या जब पॉलिसी परिवार के वित्तीय लक्ष्यों के अनुरूप नहीं होती, तो ग्राहक भुगतान बंद कर देते हैं।

रेगुलेटर के उठाए कदम

इन लैप्स को रोकने में मदद के लिए, रेगुलेटर ने अधिक लचीले सपोर्ट मैकेनिज्म को बढ़ावा दिया है। अब इंश्योररों को उन लाइफ इंश्योरेंस सेविंग्स प्रोडक्ट्स पर लोन (loan) की सुविधा देनी होगी, जिन्होंने सरेंडर वैल्यू (surrender value) हासिल कर ली है। यह पॉलिसीधारकों को पूरी पॉलिसी को रद्द करने के बजाय तत्काल जरूरतों के लिए नकदी तक पहुंचने की सुविधा देता है। इसके अलावा, प्रीमियम भुगतान के लिए 15 से 30 दिनों की अनिवार्य ग्रेस पीरियड (grace period) का पालन करना होगा, जिससे भुगतान में थोड़ी देरी होने पर भी कवरेज तुरंत समाप्त न हो।

निवेशकों के लिए क्या है मायने?

निवेशकों के लिए, यह रुझान इंश्योरेंस कंपनियों पर अपने सेल्स चैनल की गुणवत्ता बनाए रखने और बेहतर ग्राहक सेवा प्रदान करने के दबाव को उजागर करता है। जो कंपनियां आक्रामक, अल्पकालिक बिक्री की रणनीति पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं, उन्हें नियामक जांच (regulatory scrutiny) का सामना करना पड़ सकता है और रिटेंशन (retention) की समस्याओं को ठीक करने के लिए उच्च परिचालन लागतें वहन करनी पड़ सकती हैं। अगली महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अलग-अलग इंश्योरेंस कंपनियां अपनी पर्सिस्टेंसी रेश्यो (persistency ratios) को आगामी वार्षिक रिपोर्टों में कैसे रिपोर्ट करती हैं और क्या ये नियामक जनादेश लंबे समय तक पॉलिसी जारी रखने में सफलतापूर्वक स्थिरता ला पाते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.