भारत में किडनी डोनर को हेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट करने का अधिकार तो है, लेकिन यह कवरेज की गारंटी नहीं देता। बीमा कंपनियां डोनर को 'हाई-रिस्क' मानती हैं, जिससे प्रीमियम बढ़ सकता है या आवेदन खारिज हो सकता है। अपनी मेडिकल हिस्ट्री छुपाना क्लेम रिजेक्शन का सबसे बड़ा कारण बन सकता है।
किडनी डोनेट करने वाले लोगों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस मैनेज करना एक चुनौतीपूर्ण काम हो सकता है। Insurance Regulatory and Development Authority of India (IRDAI) ने डोनर्स को इंश्योरेंस पोर्ट करने की अनुमति दी है, जिसका मतलब है कि आप अपना मौजूदा वेटिंग पीरियड क्रेडिट बरकरार रखते हुए दूसरी कंपनी में स्विच कर सकते हैं। लेकिन, इसे 'अप्लाई करने का अधिकार' समझना चाहिए, न कि 'कवरेज की गारंटी'।
अंडरराइटिंग की सच्चाई
बीमा कंपनियां डोनर के रिस्क प्रोफाइल को बहुत बारीकी से देखती हैं। भले ही डोनर पूरी तरह स्वस्थ हो, लेकिन किडनी निकालना एक बड़ी मेडिकल प्रक्रिया है। जब आप नई कंपनी में आवेदन करते हैं, तो नए सिरे से अंडरराइटिंग होती है। वर्तमान में ऐसा कोई कानून नहीं है जो बीमा कंपनियों को डोनर्स से ज्यादा प्रीमियम लेने या कवर देने से मना करने से रोकता हो। नतीजतन, कंपनियां अक्सर प्रीमियम में 'लोडिंग' (अतिरिक्त चार्ज) लगा देती हैं, रीनल हेल्थ से जुड़े एक्सक्लूजन रख देती हैं, या आवेदन को पूरी तरह खारिज भी कर सकती हैं।
जानकारी छुपाने का खतरा
कई लोग अपनी डोनेशन हिस्ट्री को आवेदन फॉर्म में नहीं बताते, जो एक गंभीर गलती है। इंश्योरेंस 'अटमोस्ट गुड फेथ' (Utmost Good Faith) पर आधारित होता है। अगर आप डोनेशन की जानकारी छुपाते हैं और भविष्य में किसी भी बीमारी के लिए क्लेम करते हैं, तो कंपनी का क्लेम रिजेक्ट करने या पूरी पॉलिसी रद्द करने का कानूनी आधार बन जाता है। पोर्टिंग के दौरान वेरिफिकेशन आम पॉलिसी से ज्यादा सख्त होता है।
क्या सावधानी बरतें?
पोर्टिंग केवल मौजूदा पॉलिसी के रिन्यूअल के समय ही की जा सकती है, बीच में नहीं। सबसे जरूरी बात यह है कि जब तक नई कंपनी आपको बाइंडिंग डॉक्यूमेंट न दे दे, अपनी पुरानी पॉलिसी चालू रखें। यदि पॉलिसी लैप्स हो जाती है, तो आपके पिछले सभी लाभ खत्म हो जाएंगे और वेटिंग पीरियड फिर से 36 महीने तक के लिए शुरू हो सकता है। स्विच करने से पहले सिर्फ प्रीमियम न देखें, बल्कि हॉस्पिटल नेटवर्क और को-पेमेंट जैसी शर्तों की भी तुलना जरूर करें।
