इंश्योरेंस रेगुलेटर Irdai ने कामकाज के खर्चों (Operating Expenses) पर लगाम लगाने की योजना बनाई है। हालांकि, छोटी इंश्योरेंस कंपनियां इस बात से डरी हुई हैं कि इससे उनके मार्जिन पर बुरा असर पड़ सकता है।
बीमा क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (Irdai) ने 'एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट' (EoM) पर सख्त सीमाएं तय करने का प्रस्ताव रखा है। इसका सीधा मतलब है कि अब बीमा कंपनियों के पास एजेंट कमीशन, मार्केटिंग और अन्य प्रशासनिक खर्चों के लिए एक तय बजट होगा।
क्यों जरूरी है ये कैप?
रेगुलेटर का मानना है कि इन नियमों से कंपनियों में कार्यक्षमता (Operational Efficiency) बढ़ेगी और इसका सीधा फायदा ग्राहकों को मिलेगा। ड्राफ्ट के अनुसार, जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह सीमा उनके ग्रॉस प्रीमियम इनकम का 20% तय की गई है। वहीं, लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह दायरा और भी कम, यानी 10% से 12.5% के बीच रखने का लक्ष्य है।
छोटी कंपनियों के लिए चुनौती
बड़ी और पुरानी बीमा कंपनियों के लिए बड़े कॉर्पोरेट क्लाइंट्स के जरिए बिजनेस लाना आसान होता है, जहां खर्च कम होते हैं। इसके विपरीत, छोटी बीमा कंपनियों का बड़ा फोकस रिटेल ग्राहकों पर होता है। व्यक्तिगत परिवार को पॉलिसी बेचना काफी खर्चीला होता है, जिसमें एजेंट कमीशन और ब्रांडिंग का खर्च बहुत ज्यादा आता है। ऐसे में, ये छोटी कंपनियां इन नए नियमों के बाद पिछड़ने का डर महसूस कर रही हैं।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
शेयर बाजार में लिस्टेड इंश्योरेंस कंपनियों के निवेशकों के लिए अब बिजनेस मिक्स देखना बहुत जरूरी हो गया है। अगर फाइनल गाइडलाइंस में रिटेल और ग्रुप बिजनेस के बीच अंतर नहीं किया गया, तो रिटेल-फोकस्ड कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। बड़ी कंपनियां अपनी स्केल के चलते इन नियमों को आसानी से झेल लेंगी, लेकिन छोटी कंपनियों को अपने डिस्ट्रिब्यूशन और मार्केटिंग मॉडल को पूरी तरह से बदलना पड़ सकता है। फिलहाल पूरी इंडस्ट्री अपनी प्रतिक्रिया (Feedback) Irdai को भेजने की तैयारी कर रही है, जिस पर निवेशकों की पैनी नजर बनी हुई है।
