अक्सर पॉलिसीहोल्डर अस्पताल के छोटे दौरों के बाद क्लेम रिजेक्शन का सामना करते हैं क्योंकि वे रूटीन ओपीडी कंसल्टेशन को 'डे केयर' समझ लेते हैं। इंश्योरेंस क्लेम के लिए केवल अस्पताल में भर्ती होना काफी नहीं है, बल्कि पॉलिसी की बारीकियों को समझना और प्री-ऑथोराइजेशन लेना जरूरी है।
बहुत से लोग मानते हैं कि अस्पताल में बेड पर कुछ समय बिताने का मतलब है कि उनका इंश्योरेंस क्लेम पक्का है। लेकिन, सिर्फ अस्पताल में समय बिताना ही काफी नहीं है। सबसे बड़ी गलती तब होती है जब लोग स्टैंडर्ड हॉस्पिटलाइजेशन, डे केयर प्रोसीजर और आउटपेशेंट डिपार्टमेंट (OPD) विजिट के बीच अंतर नहीं समझ पाते। इंश्योरेंस कंपनियां केवल समय के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी सख्त कॉन्ट्रैक्ट शर्तों के आधार पर काम करती हैं।
24 घंटे का नियम और डे केयर अपवाद
आम तौर पर हेल्थ इंश्योरेंस में क्लेम के लिए 24 घंटे तक अस्पताल में भर्ती रहना अनिवार्य होता है। यह नियम इसलिए है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मरीज की मेडिकल जरूरत वास्तविक है। हालांकि, नई तकनीक के कारण अब कई उपचार कुछ घंटों में ही पूरे हो जाते हैं, जिन्हें 'डे केयर प्रोसीजर' कहते हैं। इसमें डायलिसिस, मोतियाबिंद की सर्जरी या कीमोथेरेपी जैसे इलाज शामिल हैं। अगर आपकी पॉलिसी में कोई इलाज 'डे केयर' के रूप में लिस्टेड है, तो 2 घंटे के अंदर छुट्टी मिलने पर भी क्लेम मिलेगा। असली बात समय की नहीं, बल्कि प्रोसीजर के कवर होने की है।
ओपीडी (OPD) का जाल
समस्या तब होती है जब मरीज रूटीन चेक-अप या कंसल्टेशन के लिए अस्पताल जाता है। भले ही वहां रजिस्ट्रेशन हो जाए या कुछ देर निगरानी में रखा जाए, अगर डॉक्टर उसे 'इनपेशेंट' एडमिट करने की जरूरत नहीं समझते, तो इसे ओपीडी खर्च माना जाएगा। ओपीडी का खर्च तभी मिलता है जब पॉलिसी में अलग से 'OPD कवर' हो।
अपने पैसों की सुरक्षा कैसे करें?
प्रोसीजर का सही होना ही सब कुछ नहीं है। फाइनल पेमेंट पॉलिसी की शर्तों जैसे को-पेमेंट (co-payment), डिडक्टिबल्स (deductibles) और रूम रेंट की लिमिट पर निर्भर करता है। किसी भी बड़े इलाज से पहले 'प्री-ऑथोराइजेशन' (pre-authorization) जरूर लें, जिससे आपको इलाज शुरू होने से पहले ही पता चल जाए कि कंपनी कितना खर्च उठाएगी और आप कितना कवर कर पाएंगे।
