भारत में पेट इंश्योरेंस का बूम: मज़ेदार ग्रोथ के पीछे छुपी हैं कई चुनौतियां!

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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत में पेट इंश्योरेंस का बूम: मज़ेदार ग्रोथ के पीछे छुपी हैं कई चुनौतियां!
Overview

भारत में पालतू जानवरों के लिए इंश्योरेंस का कारोबार ज़ोरों पर है। लोग अब अपने pets को परिवार का हिस्सा मानने लगे हैं और महंगे पशु चिकित्सा (Veterinary) खर्चों के चलते इंश्योरेंस की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, इस तेज़ी के बावजूद, बढ़ते इलाज के खर्च और मिलने वाले कवरेज के बीच एक बड़ी खाई बनी हुई है, साथ ही लोगों में जागरूकता की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।

पेट केयर इंडस्ट्री में बूम, इंश्योरेंस की बढ़ती मांग

भारत में पालतू जानवरों को परिवार का सदस्य मानने का चलन तेज़ी से बढ़ा है। इसी के साथ, एडवांस्ड पशु चिकित्सा (Veterinary) देखभाल का खर्च भी आसमान छू रहा है। यह वो मुख्य वजहें हैं जो भारत के पेट इंश्योरेंस बाज़ार को आगे बढ़ा रही हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पेट केयर इंडस्ट्री का साइज़ 2024 में USD 3.6 बिलियन था और 2028 तक इसके USD 7 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। यह बाज़ार सालाना करीब 17.3% की रफ़्तार से बढ़ रहा है [3, 5]।

यह ग्रोथ इस बात का सबूत है कि लोग अब अपने pets को सिर्फ़ साथी नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा मानते हैं [2, 5, 7, 10]। इस 'पेट ह्यूमनाइज़ेशन' (Pet Humanization) ट्रेंड के कारण लोग प्रीमियम फ़ूड, एक्सेसरीज़ और सबसे ज़रूरी, एडवांस्ड हेल्थकेयर पर ज़्यादा खर्च कर रहे हैं। पशु चिकित्सा (Veterinary) के खर्चे 2020 से अब तक 40% से ज़्यादा बढ़ चुके हैं, जो इंश्योरेंस लेने की एक बड़ी वजह बन रहे हैं [18]। आम सालाना चेक-अप और वैक्सीनेशन जैसे रूटीन कामों में ₹2,000 से ₹4,500 का खर्च आ सकता है [16]। वहीं, X-ray या अल्ट्रासाउंड जैसे डायग्नोस्टिक टेस्ट के लिए ₹1,200 से ₹4,000 लग सकते हैं [16]। सर्जरी का खर्च ₹5,000 से ₹50,000 या उससे भी ज़्यादा जा सकता है [16]। सिर्फ़ इमरजेंसी कंसल्टेशन के लिए ₹1,000 से ₹2,500 का बिल बन सकता है, और हॉस्पिटलाइज़ेशन का प्रति रात का खर्च ₹1,500 से ₹5,000 तक हो सकता है [16]। यह बताता है कि पेट ओनर्स पर कितना आर्थिक दबाव पड़ सकता है, इसीलिए इंश्योरेंस उनके लिए एक ज़रूरी विकल्प बनता जा रहा है।

मार्केट के खिलाड़ी और भविष्य के अनुमान

पेट इंश्योरेंस का बाज़ार भले ही अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन Bajaj Allianz, New India Assurance, Oriental Insurance, Future Generali, और Digit जैसी बड़ी इंश्योरेंस कंपनियां इसमें अपनी पैठ बना रही हैं [2, 9]। ये कंपनियाँ हर नस्ल (breed), उम्र और स्वास्थ्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए खास पॉलिसीज़ (tailored policies) ला रही हैं [2]। हालांकि, पूरे पेट केयर मार्केट के मुकाबले पेट इंश्योरेंस का हिस्सा अभी बहुत कम है। 2023 तक भारत में 1% से भी कम पालतू जानवरों का इंश्योरेंस था [9]।

बाज़ार के भविष्य को लेकर अनुमान अलग-अलग हैं। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, 2030 तक पेट इंश्योरेंस मार्केट USD 45.88 मिलियन तक पहुंच सकता है, जिसमें 1.23% की CAGR (Compound Annual Growth Rate) दिखेगी [2]। वहीं, कुछ का मानना है कि यह 2025 तक लगभग ₹6,500 करोड़ (यानी करीब USD 780 मिलियन) तक पहुंच सकता है [2, 4]। यह अंतर बाज़ार की अनिश्चितता और रफ़्तार को दिखाता है। पेट केयर इंडस्ट्री में टेलीमेडिसिन (telemedicine) और स्पेशलाइज़्ड डायग्नोस्टिक्स (specialized diagnostics) जैसी सेवाओं का भी विकास हो रहा है, जिससे एक कम्प्रीहेंसिव (comprehensive) फाइनेंशियल प्रोटेक्शन की ज़रूरत बढ़ गई है [3]|

चुनौतियां: जागरूकता से लेकर रेगुलेशन तक

तेज़ी से बढ़ते बाज़ार और पालतू जानवरों की बढ़ती संख्या के बावजूद, कुछ गंभीर चुनौतियां इस ग्रोथ की रफ़्तार को धीमा कर सकती हैं। सबसे बड़ी समस्या है पेट ओनर्स के बीच इंश्योरेंस को लेकर जागरूकता की कमी और इसे समझने में आने वाली जटिलताएं [3, 8]|

कई पॉलिसीज़ एक्सीडेंट को कवर तो करती हैं, लेकिन बीमारियों या क्रोनिक कंडीशन (chronic conditions) के लिए इनका कवरेज काफ़ी सीमित होता है, या फिर रीइम्बर्समेंट रेट (reimbursement rates) इतने कम होते हैं कि वे इलाज के बड़े खर्चों को पूरा नहीं कर पाते [8]|

यह जानना ज़रूरी है कि पॉलिसीज़ में अक्सर क्या कवर नहीं होता (exclusions) और क्या वेटिंग पीरियड्स (waiting periods) हैं। सामान्यतः, पहले से मौजूद बीमारियों (pre-existing conditions) को कवर नहीं किया जाता, और कुछ नस्लों या उम्र के हिसाब से भी सीमाएं हो सकती हैं। साथ ही, जिन नस्लों में आनुवंशिक (genetic) समस्याएं ज़्यादा होती हैं, उनके लिए प्रीमियम (premiums) ज़्यादा हो सकते हैं [14]|

सबसे अहम बात यह है कि भारत में पेट इंश्योरेंस सेक्टर के लिए कोई विशेष रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (regulatory framework) नहीं है [8]। इससे अनैतिक प्रथाओं (unethical practices) और भ्रामक पॉलिसियों (fraudulent policies) का खतरा बढ़ जाता है [8]|

इस रेगुलेटरी गैप (regulatory gap) के साथ-साथ, डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (distribution system) का बिखरा होना और सेमी-अर्बन (semi-urban) व रूरल (rural) इलाकों में ट्रेंड वेटेरिनेरियन्स (veterinarians) की कमी, अंडरराइटिंग रिस्क (underwriting risks) और कवरेज गैप्स (coverage gaps) पैदा कर सकती है, जिससे पेट ओनर्स को आर्थिक रूप से नुकसान उठाना पड़ सकता है [3, 8]|

भविष्य की राह: क्या हैं उम्मीदें?

भारत के पेट इंश्योरेंस बाज़ार का भविष्य इन्हीं चुनौतियों से निपटने पर टिका है। पेट्स को परिवार मानने का बढ़ता चलन और एडवांस्ड वेटेरिनरी ट्रीटमेंट्स (veterinary treatments) की उपलब्धता से ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है [2, 3]|

कस्टमाइज़्ड (personalized) और डिजिटल-फर्स्ट (digital-first) सॉल्यूशंस की मांग बढ़ने की संभावना है [2, 3]|

लेकिन, बाज़ार को परिपक्व (mature) होने और अपनी पूरी क्षमता हासिल करने के लिए, ज़्यादा स्पष्ट रेगुलेटरी गाइडलाइन्स, ग्राहकों की बेहतर शिक्षा और ज़्यादा पारदर्शी पॉलिसी स्ट्रक्चर्स (policy structures) बेहद ज़रूरी हैं|

जो इंश्योरर इन मुश्किलों से सफलतापूर्वक निपटेंगे और सही मायनों में व्यापक (comprehensive), रिस्क के हिसाब से उचित (risk-appropriate) कवरेज पेश कर पाएंगे, वही इस बढ़ते और संवेदनशील पेट केयर इकोनॉमी सेगमेंट का फ़ायदा उठा पाएंगे।

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