भारत का लाइफ इंश्योरेंस सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2021 से 2025 के बीच, ₹50 लाख से ज़्यादा सम एश्योर्ड वाली पॉलिसियों की संख्या में 68% की ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, यह अच्छी खबर है कि ज़्यादा वैल्यू वाली पॉलिसियों की ओर रुझान बढ़ा है, लेकिन यह भी सच है कि अब भी आधी से ज़्यादा पॉलिसियां ₹2 लाख या उससे कम का कवर देती हैं। निवेशकों को सरेंडर रेट्स पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए, जो फिलहाल मैच्योरिटी से ज़्यादा हैं, क्योंकि यह इंश्योरर्स के कैश फ्लो और लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
भारतीय लाइफ इंश्योरेंस में बड़ा बदलाव
इंश्योरेंस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (IIB) के फाइनेंशियल ईयर 2021 से 2025 के आंकड़ों से भारतीय लाइफ इंश्योरेंस बाज़ार में एक बड़ा बदलाव साफ दिख रहा है। ₹50 लाख से ज़्यादा का सम एश्योर्ड (Sum Assured) रखने वाली पॉलिसियों की संख्या 4.4 मिलियन से बढ़कर 7.4 मिलियन हो गई है, जो कि 68% की भारी वृद्धि दर्शाती है। यह दिखाता है कि जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ रही है और जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे ज़्यादा लोग अपनी फाइनेंशियल सुरक्षा को बढ़ाने के लिए आगे आ रहे हैं।
इंश्योरर के रेवेन्यू पर असर
ज़्यादा वैल्यू वाली पॉलिसियों की तरफ इस झुकाव ने प्रति पॉलिसी एवरेज एनुअल प्रीमियम (Average Annual Premium) को भी बढ़ाया है। फाइनेंशियल ईयर 2025 में यह बढ़कर ₹22,195 हो गया है, जो कि फाइनेंशियल ईयर 2021 के ₹15,567 से 42.6% ज़्यादा है। इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह एक पॉज़िटिव संकेत है, क्योंकि इससे प्रति ग्राहक ज़्यादा रेवेन्यू आने की संभावना है। हालांकि, कुल एक्टिव पॉलिसियों की संख्या लगभग 343 मिलियन पर स्थिर बनी हुई है। इसका मतलब है कि यह ग्रोथ मुख्य रूप से मौजूदा ग्राहकों द्वारा अपना कवरेज बढ़ाने से आ रही है, न कि नए ग्राहकों के जुड़ने से।
कम कवरेज की चुनौती (Underinsurance)
ज़्यादा वैल्यू वाली पॉलिसियों में बढ़ोतरी के बावजूद, सेक्टर अभी भी कम कवर वाली एक बड़ी आबादी से जूझ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2025 में, सभी एक्टिव पॉलिसियों में से 53.6% का सम एश्योर्ड ₹2 लाख या उससे कम था। हालांकि यह फाइनेंशियल ईयर 2021 के 65.1% से बेहतर है, फिर भी यह भारतीय बाज़ार की दोहरी स्थिति को उजागर करता है। लाइफ इंश्योरेंस की पैठ (Penetration) फाइनेंशियल ईयर 2025 में 2.7% पर कम बनी हुई है, जो बताता है कि बड़ी आबादी बहुत ही कम कवरेज पर निर्भर है, जो किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना में उनकी बुनियादी वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त हो सकता है।
निवेशकों के लिए जोखिम
ज़्यादा वैल्यू वाली पॉलिसियों की तरफ यह बदलाव रेवेन्यू के लिए भले ही अच्छा दिख रहा हो, लेकिन निवेशकों को कुछ महत्वपूर्ण ऑपरेशनल जोखिमों से सावधान रहना चाहिए। सेक्टर के सामने एक बड़ी चुनौती पॉलिसी सरेंडर (Surrender) और विड्रॉल (Withdrawal) की ऊंची दर है। हाल के रुझानों से पता चलता है कि पॉलिसी मैच्योर होने से पहले ही कैंसल करवाने वाले ग्राहकों को दिया जाने वाला सरेंडर पेआउट, लगातार तीन सालों से (फाइनेंशियल ईयर 2026 तक) पॉलिसी मैच्योरिटी पेआउट से ज़्यादा रहा है। इससे इंश्योरर्स पर लिक्विडिटी (Liquidity) का दबाव बनता है और यह संकेत मिलता है कि वे ग्राहकों को लंबे समय तक निवेशित रखने में संघर्ष कर रहे हैं।
सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों को नए बिजनेस ग्रोथ से आगे देखना चाहिए। ट्रैक करने योग्य प्रमुख मेट्रिक्स (Metrics) में पर्सिस्टेंसी रेश्यो (Persistency Ratios) शामिल हैं, जो यह मापती है कि कंपनी अपने ग्राहकों को कितनी अच्छी तरह बनाए रखती है, और पॉलिसी मिक्स की स्थिरता। बढ़ती सरेंडर दरें इंश्योरर्स की प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) और लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल हेल्थ को नुकसान पहुंचा सकती हैं, भले ही वे अपने नए हाई-वैल्यू बिजनेस को कितना भी बढ़ा लें।
