रेगुलेटर की बड़ी चाल, हेल्थ इन्शुरन्स में होंगे बड़े बदलाव
रेगुलेटर यानी IRDAI इस सेक्टर की गड़बड़ाहट को ठीक करने के लिए एक बड़ा प्लान लेकर आया है। IRDAI ने कहा है कि हेल्थ इन्शुरन्स मार्केट एक 'अस्थिर संतुलन' (unstable equilibrium) में फंसा हुआ है। इसे ठीक करने के लिए, IRDAI अब समझने में आसान और किफायती हेल्थ इन्शुरन्स प्रोडक्ट्स लॉन्च करेगा। इसका एक बड़ा लक्ष्य भारत में इन्शुरन्स की कम पैठ (penetration) को बढ़ाना है, जो ग्लोबल एवरेज से काफी पीछे है। जून 2026 से IRDAI बीमा कंपनियों और अस्पतालों के लिए परफॉरमेंस स्कोरकार्ड भी शुरू करेगा। इन स्कोरकार्ड में क्लेम सेटलमेंट की स्पीड, बिलिंग की सटीकता और दस्तावेज़ों के स्टैंडर्ड जैसे मापदंडों को मापा जाएगा। अस्पतालों को मिलने वाला पेमेंट उनके परफॉरमेंस से जुड़ा होगा, ताकि क्लेम जल्दी सेटल हों और देरी करने पर पेनाल्टी लगे। रेगुलेटर का यह सख्त कदम इस सेक्टर में जवाबदेही बढ़ाने के लिए उठाया गया है।
मार्केट की चुनौतियाँ और ग्लोबल तुलना
भारत का हेल्थ इन्शुरन्स मार्केट बढ़ तो रहा है, फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में प्रीमियम कलेक्शन ₹1.2 लाख करोड़ से ऊपर चला गया है। लेकिन, इसमें कई अंदरूनी समस्याएं हैं। जीडीपी के मुकाबले इन्शुरन्स पेनिट्रेशन सिर्फ 3.7% है, जबकि ग्लोबल एवरेज 7.3% है। प्रति व्यक्ति कवरेज भी दुनिया के बाकी देशों से काफी कम है। पिछले तीन सालों में 14% सालाना की मेडिकल इन्फ्लेशन और लाइफस्टाइल बीमारियों के बढ़ने से मार्केट को सहारा मिल रहा है। इससे इंश्योरेंस कंपनियों पर भारी दबाव है, जिन्होंने पिछले फाइनेंशियल ईयर में ₹85,000 करोड़ के क्लेम सेटल किए।
फाइनेंशियल दबाव और ग्राहकों की शिकायतें
सेक्टर पर लगातार फाइनेंशियल दबाव बना हुआ है। फाइनेंशियल ईयर 2025 में हेल्थ इन्शुरन्स से जुड़ी शिकायतें 41% बढ़ गईं, जिसका मुख्य कारण क्लेम में विवाद, देरी और अधूरे सेटलमेंट थे। ऐसा लगता है कि क्लेम फाइल होने और पेमेंट होने वाली राशि के बीच एक बड़ा गैप है, जो सेटलमेंट प्रोसेस में दिक्कतों का इशारा करता है। पब्लिक सेक्टर इंश्योरर्स का इनकर्ड क्लेम रेशियो (ICR) फाइनेंशियल ईयर 24 में 103% तक पहुँच गया, यानी उन्होंने प्रीमियम से ज़्यादा पैसा क्लेम में चुका दिया। हाल ही में क्लेम सेटलमेंट रेशियो भले ही 87.50% (FY24-25) पर सुधरा हो, लेकिन हेल्थ क्लेम का कुल भुगतान अक्सर प्रीमियम आय से ज़्यादा होता है। इससे इंश्योरर्स का प्रॉफिट कम हो रहा है, जिसके चलते वे क्लेम की जांच में और सख्ती बरत रहे हैं और ज़्यादा रिजेक्शन हो रहे हैं। IRDAI ने इस स्थिति को 'अस्थिर संतुलन' कहा है, जो सेक्टर की नाजुक वित्तीय स्थिति और मरीजों की देरी व बिलिंग की समस्याओं से जुड़ी शिकायतों को दर्शाता है। वहीं, अस्पताल भी अनियंत्रित बिलिंग और बढ़ती लागत से इस अस्थिरता को बढ़ा रहे हैं।
पॉलिसीहोल्डर्स के लिए इसका क्या मतलब है?
IRDAI के इस रिफॉर्म पैकेज का मकसद सिस्टम में ज़्यादा स्थिरता और अनुमान लगाने लायक स्थिति बनाना है। सरल प्रोडक्ट्स और पारदर्शी स्कोरकार्ड की ज़रुरत से, रेगुलेटर चाहता है कि पॉलिसीहोल्डर्स को सही फैसले लेने के लिए ठोस जानकारी मिले। अस्पतालों की पेमेंट को उनके परफॉरमेंस से जोड़ने से क्लेम प्रोसेसिंग तेज होगी और विवाद कम होंगे। ये बदलाव प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और वेलनेस प्रोग्राम्स को भी बढ़ावा देंगे, ताकि सिर्फ हॉस्पिटलाइजेशन पर निर्भरता कम हो। उम्मीद है कि इन बदलावों से पारदर्शिता और अफोर्डेबिलिटी बढ़ेगी। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये रिफॉर्म्स कितने प्रभावी ढंग से लागू होते हैं, जिससे इंश्योरर्स का मुनाफा बना रहे, ग्राहकों का अनुभव बेहतर हो और हेल्थ इन्शुरन्स सेक्टर में भरोसा फिर से बहाल हो।