हेल्थ कवर में बंपर ग्रोथ, पर जेब पर भारी पड़ता बोझ
भारत में हेल्थ इंश्योरेंस (Health Insurance) का दायरा काफी बढ़ गया है, और यह एक बड़ी उपलब्धि है। 2025 तक, ग्रामीण इलाकों में इंश्योरेंस पेनेट्रेशन 47.4% तक पहुंच गया है, जो शहरी इलाकों के 44.3% से आगे निकल गया है। इस ग्रोथ में सरकारी स्कीम्स का बड़ा हाथ है, जो अब ग्रामीण आबादी के 45.5% को कवर कर रही हैं, जबकि 2017-18 में यह आंकड़ा केवल 12.9% था। आयुष्मान भारत (PM-JAY) जैसी योजनाएं लाखों लोगों को वित्तीय जोखिम से बचाने का लक्ष्य रखती हैं। हालांकि, कुल मिलाकर इंश्योरेंस पेनेट्रेशन अभी भी आबादी के लगभग 15% पर है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी कम है। प्राइवेट इंश्योरर्स बाजार में हावी हैं और उम्मीद है कि 2033 तक बाजार का रेवेन्यू $62 बिलियन से पार निकल जाएगा।
बीमारियों की बढ़ती दर और जेब से होने वाले खर्च में इजाफा
कवरेज में बढ़ोतरी के ठीक विपरीत, बीमारियों की दर (Morbidity Rate) और आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर (OOPE) में भी चिंताजनक वृद्धि देखी जा रही है। 2017-18 में 7.5% की तुलना में अब 13.1% आबादी बीमारियों से प्रभावित है। यह चिंता की बात है क्योंकि भारत में कुल मौतों में लगभग 63-65% नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज (NCDs) से होती हैं। 2025 में प्रति हॉस्पिटलाइजेशन का औसत खर्च ₹34,064 रहा। यह आंकड़ा मेडिकल इन्फ्लेशन (Medical Inflation) से भी पीछे छूट रहा है, जो सालाना 12% से 14% तक अनुमानित है – यह सामान्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) से लगभग तीन गुना है। इस महंगाई के कारण OOPE का स्तर इतना बढ़ गया है कि यह वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर रहा है, जहां लगभग 17% परिवार अभी भी अपनी आय का 10% से अधिक स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं।
पहुंच में अंतर और सेक्टर पर दबाव
बेहतर इंश्योरेंस पहुंच के बावजूद, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा एक चुनौती बनी हुई है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। डॉक्टरों की कमी, अपर्याप्त सुविधाएं और खराब परिवहन व्यवस्था के कारण कई लोगों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इसका मतलब है कि बढ़ा हुआ इंश्योरेंस कवरेज हमेशा ग्रामीण निवासियों के लिए समय पर या गुणवत्तापूर्ण उपचार सुनिश्चित नहीं करता है। हेल्थकेयर सेक्टर भी लागत के भारी दबाव का सामना कर रहा है। इंपोर्टेड मेडिकल डिवाइस, स्टाफ की बढ़ती सैलरी और टेक्नोलॉजी अपग्रेड के कारण हॉस्पिटलाइजेशन चार्ज, डायग्नोस्टिक्स और स्पेशियलिटी केयर में तेज बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में, फाइनेंशियल ईयर 26 (FY26) में हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम में 10-15% की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे पॉलिसीहोल्डर अपनी कवरेज छोड़ सकते हैं। सरकारी स्वास्थ्य खर्च बढ़ रहा है, लेकिन यह अभी भी जीडीपी के लगभग 1.8% से 2.0% पर है, जो नेशनल हेल्थ पॉलिसी के 2.5% के लक्ष्य से कम है। इस अंडरफंडिंग से जेब से होने वाले खर्च और महंगे प्राइवेट हेल्थकेयर पर निर्भरता बढ़ती है।
लंबी अवधि की अफोर्डेबिलिटी और सस्टेनेबिलिटी पर सवाल
स्वास्थ्य सेवा का वर्तमान परिदृश्य इसकी लंबी अवधि की सस्टेनेबिलिटी और अफोर्डेबिलिटी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं बड़े स्वास्थ्य खर्च को कम करने का प्रयास करती हैं, लेकिन OOPE पर उनके समग्र प्रभाव पर बहस जारी है, क्योंकि कुछ प्राइवेट अस्पताल योजना की सीमाओं से ऊपर चार्ज करते हैं। NCDs का बढ़ता बोझ, खासकर बुजुर्गों में, लंबे और महंगे उपचार की आवश्यकता के कारण एक बड़ा वित्तीय जोखिम पेश करता है। प्राइवेट इंश्योरर्स को मेडिकल इन्फ्लेशन और बुजुर्ग आबादी के कारण दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जिससे बाजार का कंसॉलिडेशन और अधिक सतर्क प्रोडक्ट डेवलपमेंट हो सकता है। एशिया भर में स्वास्थ्य सेवा की बड़ी अनमेट जरूरत, जिसमें भारत एक प्रमुख योगदानकर्ता है, यह दर्शाती है कि केवल इंश्योरेंस कवरेज पहुंच या अफोर्डेबिलिटी की गारंटी नहीं देता है। इसके अलावा, PMJAY जैसी इंश्योरेंस-आधारित फाइनेंसिंग पर अत्यधिक निर्भरता ने आवश्यक पब्लिक हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर से ध्यान हटा दिया है, जो सुलभ और किफायती देखभाल के लिए महत्वपूर्ण है।
बाजार की ग्रोथ मूल मुद्दों को सुलझाने पर निर्भर
भारतीय हेल्थ इंश्योरेंस बाजार में उल्लेखनीय वृद्धि का अनुमान है, जिसमें 2033 तक रेवेन्यू $62 बिलियन से अधिक होने की उम्मीद है। हालांकि, यह विस्तार मेडिकल इन्फ्लेशन को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने और स्वास्थ्य सेवा वितरण में संरचनात्मक मुद्दों को संबोधित करने पर निर्भर करेगा। नीति निर्माताओं और उद्योग के हितधारकों को बिलिंग पारदर्शिता बढ़ाने, उपचार पैकेज को मानकीकृत करने और सेवा दक्षता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। NCDs में लगातार वृद्धि और बढ़ती आबादी के लिए निवारक देखभाल (Preventive Care) और वैल्यू-आधारित हेल्थकेयर मॉडल की ओर एक रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता होगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यापक इंश्योरेंस पहुंच सभी भारतीयों के लिए वास्तविक वित्तीय सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य परिणाम प्रदान करे।
