भारतीय जीवन बीमा (Life Insurance) पॉलिसीधारकों ने बड़े sum assured वाले प्लान्स को प्राथमिकता दी है, जिससे औसत प्रीमियम में **43%** की भारी बढ़ोतरी हुई है। FY2025 तक यह बढ़कर **₹22,195** तक पहुँच गया है। हालांकि, यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब पॉलिसी सरेंडर और विड्रॉल रेट रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, जिससे कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है।
भारत में लाइफ इंश्योरेंस की बदली तस्वीर
इंश्योरेंस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (Insurance Information Bureau) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी होल्डर्स अब पहले से कहीं ज्यादा फाइनेंशियल प्रोटेक्शन चुन रहे हैं। FY2021 और FY2025 के बीच, हर चालू पॉलिसी पर औसत सालाना प्रीमियम में करीब 43% का इजाफा हुआ है, जो ₹15,567 से बढ़कर ₹22,195 हो गया है। यह साफ दिखाता है कि लोग सिर्फ पॉलिसी की संख्या बढ़ाने की बजाय बड़े कवरेज अमाउंट को तरजीह दे रहे हैं। वहीं, देश भर में एक्टिव पॉलिसियों की कुल संख्या करीब 34.3 करोड़ पर स्थिर बनी हुई है।
हाई-वैल्यू प्लान्स की बढ़ी डिमांड
बाजार में सबसे बड़ा बदलाव हाई-वैल्यू प्लान्स में देखने को मिला है। ₹50 लाख से अधिक के सम एश्योर्ड वाली पॉलिसियों की संख्या 68% बढ़ी है और FY2025 तक यह 7.4 मिलियन तक पहुंच गई है। इसके विपरीत, ₹2 लाख या उससे कम के सम एश्योर्ड वाली छोटी पॉलिसियों का मार्केट शेयर काफी गिरा है, जो FY2021 में 65.1% था और FY2025 में घटकर 53.6% रह गया। उच्च-मूल्य वाले उत्पादों की ओर यह बदलाव इंडस्ट्री के वैल्यू चेन में ऊपर चढ़ने का संकेत देता है, जिससे इंश्योरेंस कंपनियों के लिए प्रीमियम इनकम बढ़ने की उम्मीद है।
सरेंडर का बढ़ता बोझ
हालांकि, प्रीमियम साइज में यह वृद्धि अपनी चुनौतियों के साथ आई है। नई, बड़ी पॉलिसियों से आय तो बढ़ रही है, लेकिन इंडस्ट्री जल्दी पॉलिसी सरेंडर के चिंताजनक ट्रेंड से जूझ रही है। FY2026 में, पॉलिसी सरेंडर और विड्रॉल पर कुल भुगतान ₹2.80 ट्रिलियन रहा, जो लगातार तीसरी बार पॉलिसी मैच्योरिटी पर किए गए भुगतान से अधिक है। जल्दी एग्जिट का यह ट्रेंड इंश्योरर्स के लिए लिक्विडिटी का दबाव पैदा कर रहा है। जब पॉलिसीधारक जल्दी पैसा निकालते हैं, तो कंपनियों को इन तत्काल नकदी मांगों को पूरा करने के लिए लॉन्ग-टर्म एसेट्स को बेचना पड़ता है, जिसे एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट स्ट्रेस (asset-liability management stress) कहा जाता है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
निवेशकों के लिए, यह दोहरी हकीकत समझना जरूरी है। औसत प्रीमियम में वृद्धि बेहतर प्रोडक्ट डिमांड और मौजूदा ग्राहकों से संभावित रेवेन्यू गेन का संकेत देती है। लेकिन, सरेंडर की ऊंची दरें सीधे तौर पर दबाव डालती हैं, क्योंकि इससे प्रॉफिटेबिलिटी घट सकती है और कंपनियों को अधिक नकदी रखनी पड़ सकती है, जो उनके रिटर्न ऑन कैपिटल को प्रभावित कर सकता है। बेचे गए उत्पादों और पॉलिसीधारकों के दीर्घकालिक वित्तीय लक्ष्यों के बीच तालमेल की कमी इन एग्जिट का मुख्य कारण बनी हुई है।
भविष्य में, सेक्टर की वित्तीय स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि इंश्योरर अपनी पर्सिस्टेंसी रेशियो (persistency ratios) को कितना सुधार पाते हैं। जो निवेशक इस सेक्टर पर नजर रख रहे हैं, उन्हें सिर्फ प्रीमियम ग्रोथ या नए बिजनेस मार्जिन पर ही नहीं, बल्कि तिमाही नतीजों में रिपोर्ट की जाने वाली सरेंडर दरों पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ये सीधे तौर पर कंपनी की लंबे समय तक बिजनेस बनाए रखने की क्षमता को दर्शाते हैं।
