भारतीय बीमा कंपनियां अब ग्राहक बनाने की महंगी प्रक्रिया को कम करने के लिए AI का रुख कर रही हैं। रेगुलेटरी दबाव के बीच, यह कदम रूरल मार्केट्स में पकड़ मजबूत करने और प्रॉफिट मार्जिन सुधारने में मदद करेगा।
बीमा सेक्टर अब अपनी सेल्स रणनीति को पूरी तरह से बदलने की तैयारी में है। अब तक कंपनियां थर्ड-पार्टी एग्रीगेटर्स और महंगे मार्केटिंग चैनल्स पर बहुत ज्यादा निर्भर थीं, जिससे कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर भारी दबाव रहता था। अब कंपनियां एक ऐसे AI सिस्टम को लागू कर रही हैं जो ग्राहक की तलाश से लेकर उन्हें प्रोडक्ट समझाने और क्रॉस-सेलिंग तक की पूरी प्रक्रिया को ऑटोमेट कर सके।
टियर-3 शहरों पर नजर
यह बदलाव खास तौर पर उन कंपनियों के लिए गेम-चेंजर है जो छोटे शहरों और रूरल इलाकों की क्षमता को भुनाना चाहती हैं। पहले के इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स शहरी ग्राहकों के हिसाब से डिजाइन किए जाते थे, लेकिन अब टेक्नोलॉजी के जरिए इन्हें सरल बनाया जा रहा है ताकि आम आदमी तक पहुंच आसान हो सके।
अंडरराइटिंग में बदलाव
अंडरराइटिंग (Underwriting) का काम जो पहले कागजी और धीमी प्रक्रिया थी, उसे अब डिजिटल वर्कफ्लो में बदला जा रहा है। इससे न केवल समय बच रहा है, बल्कि मैन्युअल गलती की गुंजाइश भी कम हो गई है। इससे कंपनियां अब अपने हाई-वैल्यू पोर्टफोलियो और जोखिम भरे मामलों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर पा रही हैं।
रेगुलेटरी दबाव और निवेशकों के लिए संकेत
Insurance Regulatory and Development Authority of India (IRDAI) ने कमीशन स्ट्रक्चर को लेकर सख्ती बढ़ा दी है। ऐसे में कंपनियों के लिए अब आक्रामक सेल्स के बजाय ऑपरेशनल एफिशिएंसी ही आगे बढ़ने का इकलौता रास्ता है। निवेशकों के लिए अगले कुछ क्वार्टर्स में 'एक्सपेंस रेशियो' पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा। यदि कंपनियों का AI पर किया गया निवेश सफल रहता है, तो भविष्य में यह बेहतर प्रॉफिट मार्जिन के रूप में दिखाई देगा।
