35 साल से कम उम्र के युवा हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) अब मल्टी-करोड़ टर्म इंश्योरेंस की तरफ तेजी से शिफ्ट हो रहे हैं। इस बदलाव से प्राइवेट लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन में बढ़ोतरी की उम्मीद है।
बाजार में आया बड़ा बदलाव\n\nअप्रैल 2023 के बाद से भारतीय लाइफ इंश्योरेंस सेक्टर में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिल रहा है। 35 साल से कम उम्र के युवा अब पारंपरिक इन्वेस्टमेंट-लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान्स को छोड़कर 'प्योर प्रोटेक्शन' यानी टर्म इंश्योरेंस को प्राथमिकता दे रहे हैं।\n\n### बड़े कवर की ओर रुझान\n\nआंकड़े बताते हैं कि इस सेगमेंट में औसत सम-अश्योर्ड (Sum Assured) में भारी उछाल आया है, जहां अब ₹3 करोड़ से ज्यादा के कवर वाले पॉलिसीधारकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि टर्म इंश्योरेंस पारंपरिक एंडोमेंट प्लान्स की तुलना में अधिक मार्जिन वाला प्रोडक्ट है। इसके साथ ही, एक्सीडेंटल डिसेबिलिटी और क्रिटिकल इलनेस जैसे राइडर्स (Riders) को चुनने से कंपनियों का VNB (Value of New Business) मार्जिन भी सुधर रहा है।\n\n### कंपनियों के लिए मौके और जोखिम\n\nप्राइवेट लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां जो शहरी बड़े बाजार में पकड़ रखती हैं, उन्हें इस बदलाव से सीधा फायदा हो रहा है। 'पे-टिल-60' (Pay-till-60) जैसे विकल्पों के जरिए कंपनियां ग्राहकों की कमाई के पीक इयर्स में बेहतर प्रीमियम जुटा पा रही हैं।\n\nहालांकि, इस बिजनेस मॉडल के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। इतनी बड़ी राशि की पॉलिसी के लिए अंडरराइटिंग (Underwriting) और रिस्क असेसमेंट बहुत सटीक होना चाहिए। अगर कंपनियों ने रिस्क को सही ढंग से प्राइस नहीं किया, तो लंबे समय में क्लेम रेशियो पर दबाव आ सकता है। साथ ही, इन पॉलिसीज के लिए मजबूत री-इंश्योरेंस (Reinsurance) स्ट्रेटेजी की जरूरत होती है ताकि किसी भी अचानक बड़े क्लेम की स्थिति में बैलेंस शीट सुरक्षित रहे।\n\n### निवेशकों के लिए सलाह\n\nआने वाली तिमाही के नतीजों में निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियों के पोर्टफोलियो में टर्म इंश्योरेंस का हिस्सा कितना है और राइडर अटैचमेंट रेट कैसा रहा है। लंबी अवधि में सर्विस क्वालिटी और डिजिटल क्लेम प्रोसेसिंग ही इस प्रतिस्पर्धात्मक बाजार में कंपनियों को अलग खड़ा करेगी।