भारत के नॉन-लाइफ इंश्योरेंस सेक्टर ने FY27 की पहली छमाही में **8.9%** की ग्रोथ दर्ज की है। हेल्थ और मोटर पॉलिसी की भारी मांग ने क्रॉप और फायर इंश्योरेंस में आई गिरावट की भरपाई की है, हालांकि कंपनियों के बीच जारी प्राइस वॉर निवेशकों के लिए चिंता का सबब बनी हुई है।
वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में भारतीय नॉन-लाइफ इंश्योरेंस इंडस्ट्री का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। इंडस्ट्री का कुल प्रीमियम 8.9% बढ़कर ₹1.80 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, लेकिन अलग-अलग सेगमेंट की कहानी काफी अलग है।
प्राइस वॉर का असर
इस समय मार्केट में प्राइसिंग को लेकर गलाकाट प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। खास तौर पर क्रॉप (फसल) और फायर (अग्नि) इंश्योरेंस सेगमेंट में प्रीमियम में भारी कटौती हुई है। क्रॉप इंश्योरेंस प्रीमियम में 31% और फायर इंश्योरेंस प्रीमियम में 26.6% की गिरावट आई है। पब्लिक सेक्टर की बीमा कंपनियों पर इसका असर ज्यादा हुआ है, जहां क्रॉप इंश्योरेंस प्रीमियम 59% तक गिर गया है। निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि अगर प्रीमियम गिरने के मुकाबले क्लेम में कमी नहीं आती है, तो कंपनियों के अंडरराइटिंग मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है।
हेल्थ और मोटर सेक्टर का सहारा
बाजार की कमजोरी के बीच हेल्थ और मोटर इंश्योरेंस ने सहारा दिया है। हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम 20.2% बढ़कर ₹12,847 करोड़ रहा, जिसमें रिटेल हेल्थ प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 32.8% रही। वहीं, मोटर इंश्योरेंस 12.9% की वृद्धि के साथ ₹9,256 करोड़ तक पहुंच गया।
एक बड़ा बदलाव यह है कि प्राइवेट जनरल इंश्योरेंस कंपनियों ने मार्केट शेयर को बढ़ाकर 70.9% कर लिया है, जो पिछले साल इसी अवधि में 50.9% था। यह दिखाता है कि प्राइवेट खिलाड़ी रिटेल डिमांड को बेहतर तरीके से भुना रहे हैं।
क्या प्राइसिंग अनुशासन लौट रहा है?
सितंबर के आंकड़े एक सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। फायर इंश्योरेंस प्रीमियम में गिरावट की रफ्तार धीमी होकर 13.6% रह गई है, जो जुलाई में 30.9% थी। अगर बीमा कंपनियां अब डिस्काउंट की होड़ छोड़कर सस्टेनेबल प्राइसिंग की तरफ बढ़ती हैं, तो आने वाली तिमाहियों में अंडरराइटिंग परफॉर्मेंस में स्थिरता देखी जा सकती है।
