भारतीय लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती सामने आ रही है। वित्त वर्ष 2026 (FY26) में, पॉलिसियों के सरेंडर (Surrender) और निकासी (Withdrawal) पर **₹2.80 ट्रिलियन** का भुगतान किया गया है, जो कि पॉलिसियों के मैच्योर (Mature) होने पर दिए जाने वाले भुगतान से ज़्यादा है। यह लगातार तीसरा साल है जब ऐसा हुआ है।
लगातार तीसरे साल सरेंडर भुगतान ज़्यादा
यह एक चिंताजनक ट्रेंड है जो लगातार तीसरे फाइनेंशियल ईयर से जारी है। FY26 में, पॉलिसियों को मैच्योर होने से पहले सरेंडर करने या निकालने पर कुल ₹2.80 ट्रिलियन का भुगतान किया गया। वहीं, मैच्योरिटी पर भुगतान 37% के आसपास रहा, जबकि सरेंडर और निकासी का हिस्सा अब कुल भुगतान का लगभग 39% हो गया है। यह बताता है कि बड़ी संख्या में ग्राहक या तो अपनी पॉलिसी जारी नहीं रख पा रहे हैं या फिर उन्हें मिलने वाले रिटर्न से संतुष्ट नहीं हैं।
क्या हैं इसके कारण?
इस स्थिति के पीछे मुख्य कारण प्रीमियम का अफोर्डेबल न होना (premium unaffordability) और प्रोडक्ट मिसमैच (product mismatch) माने जा रहे हैं। बढ़ती महंगाई के चलते, कई परिवारों के लिए रेगुलर प्रीमियम भरना मुश्किल हो रहा है। वहीं, कुछ इंश्योरेंस प्लान ग्राहकों के वास्तविक फाइनेंशियल लक्ष्यों या उम्मीदों से मेल नहीं खाते।
इंश्योरेंस कंपनियों पर वित्तीय दबाव
यह ट्रेंड लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (LIC) ऑफ इंडिया, एसबीआई लाइफ (SBI Life), आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ (ICICI Prudential Life) और एचडीएफसी लाइफ (HDFC Life) जैसी बड़ी कंपनियों के लिए एक बड़ी सिरदर्दी है। इंश्योरेंस कंपनियां प्रीमियम से जमा पैसे को लंबी अवधि की देनदारियों (long-term liabilities) को पूरा करने के लिए लंबी अवधि के एसेट्स (long-term assets) में निवेश करती हैं। जब बड़ी संख्या में पॉलिसियां समय से पहले सरेंडर हो जाती हैं, तो कंपनियों को अचानक कैश की मांग को पूरा करने के लिए अपने एसेट्स को समय से पहले बेचना (liquidate) पड़ता है, जिससे उनके एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट (ALM) में गड़बड़ी आती है।
इसके अलावा, यह 'वैल्यू ऑफ न्यू बिजनेस' (VNB) मार्जिन पर भी दबाव डालता है, जो इंश्योरर की प्रॉफिटेबिलिटी का एक अहम पैमाना है। अगर किसी पॉलिसी को बेचने का एक्विजिशन कॉस्ट (acquisition cost) ज़्यादा है, लेकिन ग्राहक कुछ ही सालों में पॉलिसी छोड़ देता है, तो इंश्योरर अपना शुरुआती निवेश भी वसूल नहीं कर पाता, जिससे कुल मुनाफे को नुकसान पहुँचता है।
रेगुलेटर की भूमिका और नए नियम
इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) जैसे रेगुलेटर्स और इंडस्ट्री एनालिस्ट्स का मानना है कि सेल्स पार्टनर्स को नए पॉलिसियां बेचने पर ज़्यादा इंसेंटिव (incentive) मिलने के कारण भी यह समस्या बढ़ी है, बजाय इसके कि वे मौजूदा ग्राहकों को बनाए रखने पर ध्यान दें। इससे मिस-सेलिंग (mis-selling) के मामले भी बढ़ सकते हैं।
इन समस्याओं से निपटने के लिए, IRDAI ने अक्टूबर 2024 से सरेंडर वैल्यू नॉर्म्स (surrender value norms) में संशोधन लागू किए हैं। इन नियमों का मकसद पारदर्शिता बढ़ाना और पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा करना है, ताकि सरेंडर करना ग्राहकों के लिए कम आकर्षक या ज़्यादा उचित हो। आने वाली तिमाहियों में इन नियमों के असर पर नज़र रखनी होगी। सबसे अहम मीट्रिक 'परसिस्टेंसी रेशियो' (persistency ratio) यानी कितने प्रतिशत पॉलिसियां सक्रिय रहती हैं, जिस पर निवेशकों को ध्यान देना चाहिए।
