गाड़ियों का इंश्योरेंस हुआ महंगा! टेक और EV की वजह से बढ़ रहे हैं भारी क्लेम, इंश्योरेंस कंपनियों की बढ़ी चिंता

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AuthorNeha Patil|Published at:
गाड़ियों का इंश्योरेंस हुआ महंगा! टेक और EV की वजह से बढ़ रहे हैं भारी क्लेम, इंश्योरेंस कंपनियों की बढ़ी चिंता
Overview

भारत में मोटर इंश्योरेंस क्लेम की रकम में भारी इजाफा देखा जा रहा है। यह सिर्फ हादसों की बढ़ती संख्या के कारण नहीं है, बल्कि गाड़ियों में लगी नई और जटिल टेक्नोलॉजी, खासकर इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) के महंगे कंपोनेंट्स के कारण रिपेयर का खर्च बहुत बढ़ गया है। इस वजह से SBI General Insurance और ICICI Lombard जैसी इंश्योरेंस कंपनियों के लिए मुनाफे को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।

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वाहनों में लगी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) के महंगे कंपोनेंट्स भारतीय इंश्योरेंस कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। पहले जहां छोटी-मोटी डैमेज की मरम्मत का खर्च कम होता था, वहीं अब गाड़ियों में लगे ऑटोमेटेड ड्राइवर-असिस्टेंस सिस्टम (ADAS), जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स और खास तौर पर EV की बैटरीज के कारण रिपेयर का बिल कई गुना बढ़ गया है। इससे SBI General Insurance और ICICI Lombard जैसी कंपनियों के लिए मुनाफे को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।

टेक्नोलॉजी का बढ़ता बोझ

आंकड़ों के अनुसार, सामान्य गाड़ियों के लिए जहां एक क्लेम का औसत खर्च ₹35,000 से ₹40,000 के बीच आ रहा है, वहीं प्रीमियम गाड़ियों में यह ₹1.5 लाख से ₹1.8 लाख तक पहुंच सकता है। इसके पीछे सिर्फ स्पेयर पार्ट्स की बढ़ी कीमतें ही नहीं, बल्कि कॉम्प्लेक्स इलेक्ट्रॉनिक्स और नए सेफ्टी सिस्टम्स को रिप्लेस करने का खर्च भी शामिल है। आजकल छोटी सी डैमेज में भी कई कनेक्टेड पार्ट्स को बदलना पड़ता है, जिससे मरम्मत का काम ज्यादा जटिल और महंगा हो जाता है।

EV की महंगी दुरुस्ती

इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) इस समस्या को और भी गंभीर बना रहे हैं। जहां इनका रूटीन मेंटेनेंस सस्ता हो सकता है, वहीं एक्सीडेंट होने पर इनकी मरम्मत का खर्च बहुत ज्यादा होता है। इसकी मुख्य वजह है EV की महंगी बैटरीज, जो गाड़ी की कुल लागत का 35% से 50% तक हो सकती है। साथ ही, इनके रिपेयर के लिए अभी भारत में खास इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेंड मैकेनिक की कमी है। मामूली डैमेज में भी बैटरी की जांच और खास डायग्नोस्टिक्स की जरूरत पड़ती है, जिससे क्लेम की रकम बढ़ जाती है।

महंगाई और सप्लाई चेन का असर

यह सिर्फ गाड़ियों की टेक्नोलॉजी का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि महंगाई, ग्लोबल सप्लाई चेन में दिक्कतें और लेबर की कमी का असर भी ऑटो पार्ट्स की कीमतों पर दिख रहा है। पिछले एक साल में ऑटो पार्ट्स की कीमतें 8% से ज्यादा बढ़ी हैं। गाड़ियों के रिपेयर में लगने वाले समय में भी औसतन 1.5 दिन की बढ़ोतरी हुई है, जिससे इंश्योरर्स पर क्लेम का बोझ और बढ़ रहा है।

इंश्योरेंस कंपनियों पर दबाव

ICICI Lombard, HDFC ERGO, Bajaj Allianz और Go Digit जैसी बड़ी इंश्योरेंस कंपनियां इस बढ़ती क्लेम कॉस्ट से जूझ रही हैं। Go Digit ने तो पिछले दो सालों में अपने मोटर ओन डैमेज (OD) लॉस रेशियो में काफी गिरावट देखी है। हालांकि, मोटर इंश्योरेंस प्रीमियम की बिक्री बढ़ रही है, लेकिन कीमतों को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते कंपनियां दाम बढ़ाने से हिचकिचा रही हैं। ऐसे में, कई कंपनियां मार्केट शेयर पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, बजाय इसके कि वे मुनाफे को प्राथमिकता दें।

TP सेगमेंट की पुरानी समस्या

वहीं, थर्ड-पार्टी (TP) इंश्योरेंस सेगमेंट काफी लंबे समय से दबाव में है। प्रीमियम रेट सालों से स्थिर हैं, जो बढ़ती क्लेम कॉस्ट के मुकाबले बिल्कुल भी नहीं बढ़ रहे। प्राइवेट कारों और कमर्शियल व्हीकल्स के लिए सालाना रेट हाइक बहुत मामूली रहा है, जबकि क्लेम इन्फ्लेशन 8-12% सालाना है। इस स्थिति को सुधारने के लिए मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवेज़ (MoRTH) द्वारा TP प्रीमियम में 18% से 25% तक की बढ़ोतरी पर विचार किया जा रहा है।

भविष्य की राह

एक्सपर्ट्स का मानना है कि जनरल इंश्योरेंस सेक्टर में अगले कुछ सालों में 8-14% की सालाना ग्रोथ देखने को मिल सकती है। लेकिन, इंश्योरेंस कंपनियों के मुनाफे में सुधार धीरे-धीरे ही होगा, क्योंकि क्लेम कॉस्ट बढ़ने और कीमतों पर दबाव बने रहने की उम्मीद है। EV के बढ़ते चलन से इंश्योरर्स को नए सिरे से रिस्क कैलकुलेशन और प्रोडक्ट डिजाइन करने की जरूरत होगी। साथ ही, यह भी अनुमान है कि ग्राहकों को अभी भी टोटल एक्सीडेंट कॉस्ट का 20% से 40% तक खुद वहन करना पड़ सकता है, जो उनके लिए एक अतिरिक्त बोझ है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.