GST कटौती बढ़ाती है कीमत में राहत, पर नए खरीदारों को नहीं खींच पाती
Niva Bupa के इस व्हाइट पेपर के अनुसार, हेल्थ इंश्योरेंस पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) में कटौती से प्रीमियम की कीमतें तो कम हुई हैं, लेकिन इसका सीधा फायदा ज्यादातर मौजूदा पॉलिसीधारकों को ही मिल रहा है। वे अपनी मौजूदा पॉलिसी में ज्यादा कवरेज या एडिशनल राइडर्स ले पा रहे हैं। हालांकि, रिपोर्ट का कहना है कि यह टैक्स कटौती नए या पहली बार इंश्योरेंस खरीदने वाले ग्राहकों को सीधे तौर पर बाजार में नहीं ला पा रही है। Niva Bupa के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर Nimish Agrawal ने बताया कि यह 'relevance gap' यानी प्रासंगिकता का अंतर है, जो बताता है कि केवल कीमत या पहुंच ही इंश्योरेंस को अपनाने की चुनौती को हल नहीं कर सकती।
युवा भारतीय हैं जागरूक, पर खरीदते नहीं इंश्योरेंस
खासतौर पर युवा भारतीयों में एक बड़ा गैप देखा जा रहा है। जहां 51% युवा हेल्थ इंश्योरेंस को जरूरी मानते हैं, वहीं केवल 14% के पास ही वास्तव में कोई पॉलिसी है। इसकी मुख्य वजह सिर्फ महंगा होना नहीं है, बल्कि उन्हें यह महसूस होता है कि इंश्योरेंस की फिलहाल कोई प्रासंगिकता (relevance) नहीं है। वे अक्सर यह सोचते हैं कि जब तक वे बीमार नहीं हैं, तब तक उन्हें इसकी जरूरत नहीं है और इसे भविष्य की चिंता मानते हैं। यह 'impatience gap' या अधीरता का अंतर इस पीढ़ी की अपेक्षाओं से जुड़ा है, जो किसी भी खर्च से तुरंत फायदा चाहती है। पारंपरिक हेल्थ इंश्योरेंस, जो अप्रत्याशित घटनाओं के लिए एक सुरक्षा कवच है, इस उम्मीद को पूरा करने में संघर्ष कर रहा है।
इंश्योरर्स को कवरेज से बढ़कर देना होगा
इस स्थिति से निपटने के लिए, इंश्योरेंस कंपनियों को सिर्फ हॉस्पिटलाइजेशन के खर्च को कवर करने से आगे बढ़कर सोचना होगा। आज की स्वास्थ्य जरूरतों में आउट पेशेंट केयर, डायग्नोस्टिक्स और पुरानी बीमारियों के इलाज पर भी काफी खर्च आता है, जो अक्सर मौजूदा पॉलिसियों में कवर नहीं होता। इसलिए, कंपनियां अब टेलीकंसल्टेशन, वेलनेस प्रोग्राम, हेल्थ चेक-अप और डिजिटल हेल्थ टूल्स जैसी सुविधाएं देकर तत्काल वैल्यू (immediate value) जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। इसका मकसद ग्राहकों को लगातार जोड़े रखना और इंश्योरेंस को एक 'प्रोटेक्टिव नेट' (reactive safety net) से एक 'हेल्थ पार्टनर' (proactive health partner) के तौर पर स्थापित करना है। Onsurity और ekincare जैसी कंपनियां पहले से ही अपने कर्मचारियों के लिए वेलनेस और प्रिवेंटिव केयर के साथ सब्सक्रिप्शन-बेस्ड हेल्थ बेनिफिट्स दे रही हैं, जो इस ट्रेंड की ओर इशारा करता है। यह बदलाव युवा खरीदारों को आकर्षित करने और पॉलिसी छोड़ने की दर को कम करने के लिए बहुत जरूरी है।
भरोसे की कमी और बाजार की बाधाएं
भारत के हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट में अभी भी कई संरचनात्मक समस्याएं मौजूद हैं। शहरों में छोटे कस्बों की तुलना में अविश्वास (distrust) का स्तर ज्यादा है, जिसका कारण अच्छे-बुरे दोनों तरह के अनुभवों का ज्यादा सामना होना है। डिजिटल चैनल जागरूकता बढ़ाने में मददगार हैं, लेकिन बिक्री क्लोज करने में पर्सनल टच अभी भी अहम है। देश में इंश्योरेंस की पहुंच (penetration rate) अभी भी GDP का लगभग 3.7% है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है, और इसमें क्षेत्रीय अंतर भी बड़े हैं। दावों के निपटान में देरी, जटिल कागजी कार्रवाई और भ्रामक उत्पाद भी ग्राहकों का भरोसा कम करते हैं। इन सबके बीच, 14% की सालाना मेडिकल इन्फ्लेशन (medical inflation) इस मुश्किल को और बढ़ा देती है, जिससे बेहतर वैल्यू और भरोसेमंदता (trust) मार्केट ग्रोथ के लिए बेहद जरूरी हो जाती है।
मजबूत ग्रोथ की ओर भारतीय हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट
इन चुनौतियों के बावजूद, भारत का हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट काफी मजबूत ग्रोथ के लिए तैयार है। Niva Bupa इस सेक्टर में एक बड़ा खिलाड़ी है, जिसका कुल हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट में लगभग 5.31% और प्राइवेट स्टैंडअलोन इंश्योरर के बीच 17.59% का मार्केट शेयर है (FY25 तक)। कंपनी ने हाल ही में नवंबर 2024 में ₹2,200 करोड़ का IPO पूरा किया है। उम्मीद है कि 2032 तक यह मार्केट बढ़कर USD 39.5 बिलियन तक पहुंच जाएगा। बढ़ती स्वास्थ्य लागत, लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां और 'आयुष्मान भारत' जैसी सरकारी योजनाओं के कारण यह ग्रोथ संभव है। प्राइवेट इंश्योरर्स, जो मार्केट का लगभग 63-65% हिस्सा रखते हैं, टेलर्ड प्लान और डिजिटल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर इस विस्तार का नेतृत्व कर रहे हैं। एनालिस्ट्स को डबल-डिजिट ग्रोथ की उम्मीद है, जो ग्राहकों की बदलती जरूरतें, डिजिटल अपनाने में तेजी और प्रिवेंटिव व वेलनेस-केंद्रित उत्पादों की ओर बढ़ते रुझान से प्रेरित है। InsurTech और इंटीग्रेटेड हेल्थ सर्विसेज का उदय इंश्योरेंस को देखने और इस्तेमाल करने के तरीके को बदलने में तेजी लाएगा।
