जनरल इंश्योरेंस प्रीमियम ₹3.36 लाख करोड़ पार, पर मुनाफा 23% गिरा!

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AuthorAditya Rao|Published at:
जनरल इंश्योरेंस प्रीमियम ₹3.36 लाख करोड़ पार, पर मुनाफा 23% गिरा!

FY26 में भारतीय जनरल इंश्योरेंस सेक्टर ने 9% की दमदार ग्रोथ दर्ज की है, जिसमें प्रीमियम इनकम ₹3.36 लाख करोड़ के पार पहुंच गई। हालांकि, हेल्थ इंश्योरेंस की वजह से यह उछाल आया, पर इंडस्ट्री का कुल मुनाफा 23% घटकर ₹10,000 करोड़ रह गया। लगातार बढ़ते क्लेम्स और ऑपरेटिंग खर्चे इस गिरावट की मुख्य वजह बने हैं।

क्यों गिरी मुनाफे की गाड़ी?

FY26 में भारतीय जनरल इंश्योरेंस इंडस्ट्री ने कुल डायरेक्ट प्रीमियम इनकम (GDPI) में 9% का इजाफा करते हुए ₹3.36 लाख करोड़ का आंकड़ा छुआ। यह बताता है कि देश में इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स की डिमांड अच्छी है, खासकर शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में।

लेकिन, इस ग्रोथ के पीछे छिपी एक कड़वी सच्चाई यह है कि इंडस्ट्री का नेट प्रॉफिट आफ्टर टैक्स (PAT) 23% लुढ़ककर सिर्फ ₹10,000 करोड़ रह गया। इंडस्ट्री का रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE), जो कि एफिशिएंसी का एक अहम पैमाना है, पिछले साल के 9% से घटकर 6% पर आ गया। ये आंकड़े रेवेन्यू ग्रोथ और बॉटम-लाइन परफॉर्मेंस के बीच बड़ी खाई दिखा रहे हैं।

किस सेगमेंट से आई ग्रोथ?

हेल्थ इंश्योरेंस इस बार इंडस्ट्री का स्टार परफॉर्मर रहा, जिसमें 17% की जबरदस्त ग्रोथ देखने को मिली। लोगों में हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर बढ़ती जागरूकता और जरूरतें इस ग्रोथ की वजह हैं। मगर, इस तेजी के साथ खर्च भी बढ़ा है। डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए भारी निवेश की वजह से हेल्थ इंश्योरेंस सेगमेंट का ROE -7% पर रहा, जो प्रॉफिटेबल अंडरराइटिंग की चुनौती को साफ दिखाता है।

मोटर इंश्योरेंस में भी करीब 9% की ग्रोथ दर्ज की गई। हालांकि, रिन्यूअल वाले पोर्टफोलियो में बढ़ते खर्चों को प्रीमियम में पास ऑन करना इंश्योरर्स के लिए मुश्किल साबित हुआ। इसमें भी थर्ड पार्टी कवर का ROE 22% रहा, वहीं 'ओन डैमेज' कैटेगरी -34% के नेगेटिव ROE के साथ दबाव में दिखी।

प्रॉफिटेबिलिटी का संकट

निवेशकों के लिए सबसे अहम पैमाना कंबाइंड रेशियो है, जो FY26 में बढ़कर 113% हो गया। आसान भाषा में कहें तो, प्रीमियम से कमाए हर 100 रुपये पर इंश्योरर्स 100 रुपये से ज्यादा क्लेम्स और ऑपरेटिंग खर्चों में दे रहे हैं। इस रेशियो में 2% की बढ़ोतरी बताती है कि खर्च और क्लेम्स, प्रीमियम कलेक्शन से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं।

प्राइवेट सेक्टर के इंश्योरर्स ने पब्लिक सेक्टर के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया। प्राइवेट कंपनियों की ग्रोथ 10% रही, जबकि पब्लिक सेक्टर की 8%। पब्लिक सेक्टर इंश्योरर्स को और मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उनका कंबाइंड रेशियो बढ़कर 128% हो गया और ROE गिरकर -4% पर आ गया।

आगे क्या देखना होगा?

अब इंडस्ट्री का फोकस सिर्फ वॉल्यूम बढ़ाने से हटकर डिसिप्लिन्ड अंडरराइटिंग पर होगा। जो कंपनियां अपने कंबाइंड रेशियो को कंट्रोल कर सकेंगी और हेल्थ इंश्योरेंस जैसे सेगमेंट्स में खर्चों को मैनेज कर पाएंगी, वे ही आगे निकलेंगी। निवेशकों को अब बेहतर प्राइसिंग पावर, क्लेम मैनेजमेंट में सुधार और घाटे वाले कैटेगरीज से दूरी बनाने के संकेतों पर बारीकी से नजर रखनी होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.