पेंशन सेक्टर में 100% FDI की राह साफ
सरकार जल्द ही संसद में एक बिल पेश करेगी जिसमें पेंशन फंड में 100% फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) की इजाज़त होगी। फिलहाल यह सीमा 49% है, जबकि इंश्योरेंस सेक्टर में इसे हाल ही में 74% और फिर 100% तक बढ़ाया गया है। इस कदम से भारत के रिटायरमेंट सेविंग्स मार्केट में विदेशी वित्तीय संस्थानों को आने का रास्ता साफ होगा। इस उदारीकरण से प्रतिस्पर्धा (competition) बढ़ेगी, नए प्रोडक्ट्स आएंगे और ग्राहकों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी। इस लिबरलाइजेशन के लिए डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT), रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) जैसे निकायों से रेगुलेटरी अपडेट्स की ज़रूरत होगी।
NPS ट्रस्ट और PFRDA के बीच अलगाव का प्रस्ताव
एक और अहम प्रस्ताव के तहत नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) ट्रस्ट को पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) से अलग किया जाएगा। अभी PFRDA पेंशन सेक्टर को रेगुलेट भी करता है और NPS ट्रस्ट को मैनेज भी, जिससे हितों के टकराव (conflict of interest) की आशंका रहती है। नई व्यवस्था में NPS ट्रस्ट एक इंडिपेंडेंट बॉडी होगी, जिसके बोर्ड में 15 सदस्य हो सकते हैं और सरकार का बहुमत रहेगा। इससे PFRDA पूरी तरह रेगुलेटरी भूमिका पर ध्यान दे सकेगा। इस बदलाव को अमली जामा पहनाने के लिए PFRDA एक्ट, 2013 में संशोधन की ज़रूरत होगी, जो प्रस्ताव वर्षों से विचाराधीन है।
बाज़ार की क्षमता और पूंजी की ज़रूरत
भारत का पेंशन मार्केट अभी भी काफी अंडर-पेनेट्रेटेड है, जो देश के GDP का महज़ 3% है। उम्मीद है कि 2030 तक मैनेजमेंट के तहत एसेट्स (Assets Under Management - AUM) करीब ₹118 लाख करोड़ तक पहुंच जाएंगे। 2023 में पेंशन फंड मार्केट का वैल्यू $38.23 बिलियन था और इसमें तेज़ी से ग्रोथ की उम्मीद है। 100% FDI से उस लंबी अवधि की पूंजी को आकर्षित करने में मदद मिलेगी, जो बचत को इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे प्रोडक्टिव निवेशों के लिए जुटाने हेतु ज़रूरी है। पिछली बार इंश्योरेंस FDI कैप में वृद्धि से लिक्विडिटी और प्रतिस्पर्धा में काफी बढ़ोतरी हुई थी, और पेंशन सेक्टर में भी ऐसे ही नतीजे दिखने की उम्मीद है।
रेगुलेटरी बाधाएं और प्रतिस्पर्धा की चुनौतियां
हालांकि 100% FDI से पूंजी प्रवाह और बाज़ार ग्रोथ की उम्मीद है, लेकिन निवेशकों को जटिल रेगुलेटरी माहौल से निपटना होगा। पूरी तरह से विदेशी स्वामित्व वाले पेंशन फंड्स को PFRDA के 'गार्डरेल्स' और शर्तों का पालन करना होगा, ठीक वैसे ही जैसे IRDAI इंश्योरेंस कंपनियों के लिए तय करता है। इनमें बोर्ड की संरचना, प्रमुख मैनेजरों का रेज़िडेंसी और सॉल्वेंसी मार्जिन जैसे सख्त नियम शामिल हो सकते हैं। PFRDA के नियम, जिनमें अक्सर भारतीय डेट और इक्विटी फंड्स के प्रबंधन का पूर्व अनुभव मांगा जाता है, अगर शिथिल नहीं किए गए तो नए विदेशी प्लेयर्स के लिए एंट्री बैरियर बन सकते हैं। NPS ट्रस्ट-PFRDA अलगाव से निगरानी और समन्वय में नई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
