क्या हुआ है?
भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने साफ कर दिया है कि जिन लोगों के पास एक से ज़्यादा हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियां हैं, जैसे कि एक पर्सनल पॉलिसी और एक एम्प्लॉयर-प्रोवाइडेड पॉलिसी, वे किसी एक हॉस्पिटलाइजेशन (Hospitalization) के खर्च को कवर करने के लिए दोनों का इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर किसी मेडिकल बिल की राशि पहली पॉलिसी की सम एश्योर्ड से ज़्यादा है, तो बाकी बचे हुए पैसे दूसरी पॉलिसी से क्लेम किए जा सकते हैं। हालांकि, कुल मिलाकर आपको उतना ही पैसा वापस मिलेगा जितना आपका असल मेडिकल खर्च हुआ है।
पॉलिसीधारकों के लिए क्यों है ये ज़रूरी?
कई बार ऐसा होता है कि एक बड़ी मेडिकल इमरजेंसी के लिए एक हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी काफी नहीं होती। पहले, कई इंश्योरर से क्लेम लेना मुश्किल होता था और कभी-कभी वे क्लेम का एक तय हिस्सा ही देते थे, जिससे पॉलिसीधारक को पूरा फायदा नहीं मिल पाता था। लेकिन नए नियमों के तहत, अब मरीज अपनी पहली पॉलिसी की लिमिट पूरी होने के बाद दूसरी इंश्योरेंस कंपनी से बची हुई रकम के लिए क्लेम कर सकते हैं। यह एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि अगर आपकी सभी पॉलिसियों की कुल कवरेज राशि पर्याप्त है तो आपको अपनी जेब से भुगतान न करना पड़े।
क्लेम प्रोसेसिंग में आया बड़ा बदलाव
साल 2013 से, रेगुलेटर ने 'कंट्रीब्यूशन क्लॉज' (Contribution Clause) को खत्म कर दिया था, जिसके तहत इंश्योरर को क्लेम की राशि को बांटना पड़ता था। अब, पॉलिसीधारकों को यह चुनने की आज़ादी है कि वे किस इंश्योरर से अपना पहला क्लेम फाइल करना चाहते हैं। पहली इंश्योरेंस कंपनी उपलब्ध सम एश्योर्ड तक बिल का भुगतान करती है। क्लेम सेटल (Settle) होने के बाद, मरीज को एक सेटलमेंट लेटर मिलता है, जो दूसरी इंश्योरेंस कंपनी से बाकी रकम के लिए क्लेम करने का ज़रूरी दस्तावेज़ है। इस बदलाव से ग्राहकों को अपने प्रीमियम का ज़्यादा से ज़्यादा फायदा उठाने की ताकत मिली है।
प्रक्रिया कैसे काम करती है?
इस प्रक्रिया को अच्छे से संभालने के लिए, पॉलिसीधारक को एक पॉलिसी को प्राइमरी क्लेम और दूसरी को सेकेंडरी क्लेम मानना होगा। यह ज़रूरी है कि आप शामिल सभी इंश्योरेंस प्रोवाइडर्स को अपनी बाकी पॉलिसियों के बारे में बताएं। जब आप अपना पहला क्लेम फाइल करें, तो सुनिश्चित करें कि आपको एक विस्तृत क्लेम सेटलमेंट लेटर मिले और सभी ओरिजिनल डॉक्यूमेंट्स जैसे डिस्चार्ज समरी, फार्मेसी बिल और लैब रिपोर्ट की सर्टिफाइड कॉपी अपने पास रखें। इन डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल दूसरी इंश्योरेंस कंपनी के साथ क्लेम को सपोर्ट करने के लिए किया जाएगा, जो अपनी पॉलिसी की शर्तों के आधार पर अनुरोध का मूल्यांकन करेगी।
इंश्योरर्स पर ऑपरेशनल असर
स्टार हेल्थ, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड और एचडीएफसी एर्गो जैसी लिस्टेड हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए, यह रेगुलेटरी क्लैरिटी (Regulatory Clarity) का मतलब है कि क्लेम प्रोसेसिंग सिस्टम मज़बूत होने चाहिए। यह ग्राहक अनुभव को बेहतर बनाता है, लेकिन साथ ही इंश्योरर्स पर यह ज़िम्मेदारी भी डालता है कि वे धोखाधड़ी या डुप्लीकेट क्लेम को रोकने के लिए दूसरी कंपनियों के डॉक्यूमेंट्स की अच्छी तरह से जांच करें। हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों को इस बात पर नज़र रखनी चाहिए कि ये कंपनियां पिछले सेटलमेंट्स को वेरिफाई करने और मेडिकल खर्चों को क्रॉस-वेरिफाई करने के बढ़ते एडमिनिस्ट्रेटिव लोड (Administrative Load) को कितनी कुशलता से संभालती हैं।
संभावित जोखिम और चुनौतियां
पॉलिसीधारकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती डॉक्यूमेंटेशन की प्रक्रिया है। कई क्लेम को मैनेज करना समय लेने वाला और गलतियों से भरा हो सकता है। अगर आप शुरुआत में ही सभी पॉलिसियों का खुलासा नहीं करते हैं या पहली इंश्योरर से मिला सेटलमेंट लेटर खो देते हैं, तो दूसरे क्लेम में देरी या रिजेक्शन हो सकता है। इसके अलावा, क्योंकि हर पॉलिसी की अपनी शर्तें और नियम होते हैं, हो सकता है कि जो इलाज पहली इंश्योरेंस कंपनी कवर करती है, वह दूसरी कंपनी कवर न करे, जिससे कुछ खर्चे क्लेम के दायरे से बाहर रह जाएं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों और पॉलिसीधारकों को क्लेम प्रोसेसिंग में और ज़्यादा डिजिटलाइजेशन (Digitalization) पर नज़र रखनी चाहिए। जैसे-जैसे इंडस्ट्री इंटीग्रेटेड डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड्स की ओर बढ़ रही है, सेकेंडरी क्लेम फाइल करने में आसानी होने की उम्मीद है। ध्यान देने योग्य मुख्य बातें यह होंगी कि सेक्टर में क्लेम सेटलमेंट का औसत टर्नअराउंड टाइम (Turnaround Time) क्या रहता है और इंश्योरेंस कंपनियां कैसे टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके लागत या प्रोसेसिंग टाइम को बढ़ाए बिना मल्टी-पॉलिसी वेरिफिकेशन (Multi-policy Verification) को संभालती हैं।
