IRDAI का बड़ा फैसला: हेल्थ इंश्योरेंस के नियमों में सख्ती, अब क्लेम सेटलमेंट के लिए तय हुई डेडलाइन

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AuthorMehul Desai|Published at:
IRDAI का बड़ा फैसला: हेल्थ इंश्योरेंस के नियमों में सख्ती, अब क्लेम सेटलमेंट के लिए तय हुई डेडलाइन

IRDAI ने पॉलिसीहोल्डर्स के हक में बड़ा कदम उठाया है। अब कैशलेस क्लेम और डिस्चार्ज अप्रूवल के लिए सख्त टाइम-लिमिट तय कर दी गई है। इन बदलावों से कंपनियों पर ऑपरेशनल दबाव बढ़ेगा और निवेशकों को मार्जिन पर पड़ने वाले असर पर नजर रखनी होगी।

इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) ने हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम सेटलमेंट को लेकर कड़े नियम लागू कर दिए हैं, जिससे अब पूरा जोर इंश्योरेंस कंपनियों की सर्विसिंग क्षमता पर आ गया है। रेगुलेटर का मकसद ग्राहकों को होने वाली देरी को खत्म करना है, लेकिन इससे पूरे इंश्योरेंस सेक्टर के लिए परिचालन संबंधी (operational) चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं।

कैशलेस क्लेम के लिए सख्त समय-सीमा

नए नियमों के तहत, हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों को अस्पतालों से प्राप्त कैशलेस प्री-ऑथराइजेशन रिक्वेस्ट को 1 घंटे के भीतर प्रोसेस करना होगा। इतना ही नहीं, फाइनल डिस्चार्ज रिक्वेस्ट मिलने के बाद कंपनी को केवल 3 घंटे के अंदर अप्रूवल देना अनिवार्य है। ये कोई सुझाव नहीं बल्कि रेगुलेटरी नियम हैं। अगर कंपनी के देरी करने की वजह से मरीज को अस्पताल में ज्यादा समय रुकना पड़ा, तो उस अतिरिक्त खर्च की भरपाई कंपनी को खुद करनी होगी, पॉलिसी कवर से नहीं।

निवेशकों के लिए यह एक बड़ी ऑपरेशनल चुनौती है। कंपनियों को इन टारगेट्स को पूरा करने के लिए टेक्नोलॉजी, ऑटोमेशन और वर्कफोर्स पर ज्यादा खर्च करना होगा। जिन कंपनियों का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर है, उनकी लागत बढ़ सकती है और यह उनके ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर डाल सकता है।

5 साल का मोरेटोरियम पीरियड

डिस्क्लोजर विवादों को लेकर मोरेटोरियम पीरियड को घटाकर अब 60 महीने यानी 5 साल कर दिया गया है। इसका मतलब है कि पॉलिसी लेने के 5 साल बाद, कंपनियां आमतौर पर पुरानी हेल्थ कंडीशंस का हवाला देकर क्लेम रिजेक्ट नहीं कर पाएंगी (सिवाय धोखाधड़ी के मामलों के)। हालांकि यह ग्राहकों का भरोसा बढ़ाएगा, लेकिन इससे कंपनियों का लॉन्ग-टर्म रिस्क प्रोफाइल बढ़ सकता है। इससे इंडस्ट्री के ओवरऑल लॉस रेशियो पर असर पड़ने की संभावना है।

ओंबड्समैन (Ombudsman) विवाद और जुर्माना

रेगुलेटर ने शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया को भी सख्त कर दिया है। कंपनियों को नोटिस मिलने के 7 दिनों के भीतर अपना जवाब और दस्तावेज जमा करने होंगे, जबकि किसी भी अतिरिक्त जानकारी के लिए उनके पास केवल 3 दिन का समय होगा। यदि कंपनी 30 दिनों के भीतर ओंबड्समैन के अवार्ड का पालन नहीं करती है, तो उसे शिकायतकर्ता को ₹5,000 प्रति दिन के हिसाब से जुर्माना और पेनल्टी इंटरेस्ट देना होगा।

निवेशकों के लिए क्या है मुख्य नजरिया?

निवेशकों को अब कंपनियों के 'कंबाइंड रेशियो' (Combined Ratio) पर नजर रखनी चाहिए, जो क्लेम और ऑपरेटिंग खर्चों का एक पैमाना है। यदि कंपनियां अपने क्लेम प्रोसेस को ऑटोमेट नहीं कर पाती हैं, तो उनका प्रशासनिक खर्च (administrative expenses) बढ़ना तय है। आने वाले तिमाही नतीजों में मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखें, खासकर टेक्नोलॉजी पर होने वाले खर्च और मोरेटोरियम नियमों में बदलाव के कारण क्लेम सेटलमेंट रेशियो में होने वाले बदलावों पर।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.