IRDAI ने इंश्योरेंस सेक्टर में बड़े बदलावों का ऐलान किया है। अब कमीशन और खर्चों पर नई सीमाएं तय कर दी गई हैं, ताकि कंपनियों का ध्यान सिर्फ सेल्स वॉल्यूम बढ़ाने के बजाय ग्राहकों को बेहतर सलाह देने पर रहे।
इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) ने भारत में इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स के डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल को पूरी तरह से बदलने की तैयारी कर ली है। इस नई गाइडलाइन का मकसद इंडस्ट्री के फाइनेंशियल स्ट्रक्चर को दुरुस्त करना है, जिसके तहत कमीशन और मैनेजमेंट खर्चों पर सख्त नियंत्रण लागू किया गया है।
क्यों लिया गया यह कदम?
अब तक भारतीय इंश्योरेंस सेक्टर पूरी तरह से 'वॉल्यूम-ड्रिवन' मॉडल पर चल रहा था, जहाँ कंपनियों का फोकस सिर्फ ज्यादा से ज्यादा पॉलिसी बेचने पर रहता था। इस होड़ में अक्सर ग्राहकों की जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया जाता था। रेगुलेटर अब इस ट्रेंड को बदलकर इसे 'क्वालिटी-बेस्ड' अप्रोच की तरफ ले जाना चाहता है, जिससे ग्राहकों को लंबे समय तक बेहतर सर्विस मिल सके।
इंडस्ट्री पर असर
Generali Central Life Insurance के MD और CEO, आलोक रुंगटा के मुताबिक, सबसे बड़ी चुनौती डिस्ट्रीब्यूशन एफिशिएंसी को बनाए रखने की होगी। अब कंपनियों को अपने एजेंट्स, ब्रोकर्स और बैंकाश्योरेंस पार्टनर्स के साथ काम करने के पुराने तरीकों को फिर से परखना होगा।
Equirus Raghnall Insurance Broking के डायरेक्टर, अमित गोयल का कहना है कि यह बदलाव इंटरमीडियरीज और ग्राहकों के रिश्तों को पूरी तरह बदल देगा। अब कमीशन सीधे तौर पर 'क्वालिटी ऑफ रिन्यूअल' से जुड़ जाएगा, जिससे भरोसे की कमी और गलत पॉलिसी बेचने जैसी समस्याएं कम होंगी।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों को यह समझना होगा कि शॉर्ट टर्म में इंश्योरेंस कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है क्योंकि उन्हें अपने ऑपरेटिंग खर्चों को फिर से कैलकुलेट करना होगा। हालांकि, लंबी अवधि में यह सुधार एक ज्यादा स्टेबल और भरोसेमंद कस्टमर बेस तैयार करेगा, जो इंश्योरेंस सेक्टर की सस्टेनेबल ग्रोथ के लिए बेहद जरूरी है। निवेशकों को आने वाले दिनों में कंपनियों की ऑपरेशनल एफिशिएंसी और मार्जिन पर पड़ने वाले असर पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।
