बीमा रेगुलेटर IRDAI अब पॉलिसीधारकों के लिए पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू पर लोन लेने का नया मैकेनिज्म तैयार कर रहा है, ताकि आर्थिक तंगी के समय पॉलिसी को बीच में बंद होने से बचाया जा सके।
बीमा क्षेत्र के रेगुलेटर IRDAI ने अब एक ऐसे स्ट्रक्चर्ड फ्रेमवर्क पर काम शुरू किया है, जिसके जरिए पॉलिसीधारक अपनी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू के बदले लोन ले सकेंगे। इसका मुख्य मकसद यह है कि जब किसी व्यक्ति की कमाई में अस्थिरता आए या वह वित्तीय संकट से गुजर रहा हो, तो वह अपनी पॉलिसी को लैप्स (Lapse) करने के बजाय उसे सुरक्षित रख सके।
क्यों है इसकी जरूरत?
भारत में लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए समय से पहले पॉलिसी का सरेंडर होना एक बड़ी चुनौती है। अक्सर जब परिवारों पर पैसों का दबाव आता है, तो वे सबसे पहले बीमा कवरेज को ही बंद करते हैं। इससे न केवल कंपनी का लॉन्ग-टर्म रेवेन्यू गिरता है, बल्कि ग्राहक की वित्तीय सुरक्षा भी खत्म हो जाती है। मौजूदा समय में, ऐसे लोग अक्सर अनरेगुलेटेड या अनौपचारिक उधारदाताओं के चंगुल में फंस जाते हैं, जो काफी जोखिम भरा होता है।
Persistency Ratio पर होगा असर
अगर यह नियम लागू होता है, तो बीमा सेक्टर के लिए सबसे महत्वपूर्ण मेट्रिक 'परसिस्टेंसी रेशियो' (Persistency Ratio) में बड़ा सुधार देखने को मिल सकता है। जिन कंपनियों का परसिस्टेंसी रेशियो बेहतर होता है, उन्हें ज्यादा स्थिर माना जाता है, क्योंकि इससे कंपनी को लगातार प्रीमियम मिलता रहता है और नए ग्राहक जुटाने की लागत भी कम हो जाती है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों को यह समझना चाहिए कि यह अभी एक शुरुआती प्रस्ताव है। इसके फाइनल फ्रेमवर्क में यह देखना दिलचस्प होगा कि लोन का स्ट्रक्चर क्या होगा, क्रेडिट रिस्क कैसे आंका जाएगा और इसमें बैंक या NBFC की भूमिका क्या होगी। फिलहाल यह कोई तुरंत लागू होने वाला बदलाव नहीं है, इसलिए निवेशकों को IRDAI के अगले ड्राफ्ट गाइडलाइंस या डिस्कशन पेपर का इंतजार करना चाहिए।
