भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। अब से सिर्फ 2 घंटे के अस्पताल में एडमिट रहने पर भी क्लेम (Claim) मिल सकेगा। पहले कई तरह के छोटे इलाज या डे-केयर प्रोसीजर के लिए कम से कम 24 घंटे के एडमिट होने की शर्त होती थी, जिसे अब हटा दिया गया है।
क्या है नया नियम?
IRDAI ने अपने नए दिशानिर्देशों में स्पष्ट किया है कि अब स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों के तहत केवल 2 घंटे के अस्पताल में भर्ती होने पर भी क्लेम स्वीकार किए जाएंगे। यह बदलाव खासतौर पर उन मरीजों के लिए फायदेमंद होगा जिन्हें छोटी-मोटी सर्जरी या ऑब्ज़र्वेशन के लिए अस्पताल में रुकना पड़ता था और 24 घंटे की शर्त के कारण उन्हें अपनी जेब से भुगतान करना पड़ता था। नई व्यवस्था चिकित्सा की आधुनिक पद्धतियों के अनुरूप है, जिससे बीमा को आम आदमी के लिए और अधिक सुलभ बनाया जा सके।
कंपनियों पर क्या होगा असर?
इस फैसले से इंश्योरेंस कंपनियों के कामकाज में बड़ा बदलाव आएगा। अब उन्हें पहले की तुलना में अधिक संख्या में छोटे क्लेम प्रोसेस करने होंगे। जहां एक ओर यह ग्राहकों के लिए अच्छी खबर है, वहीं दूसरी ओर कंपनियों के लिए ऑपरेशनल दबाव बढ़ेगा। कम अवधि के क्लेम को कुशलता से मैनेज करने का सबसे बड़ा चैलेंज ये होगा कि वे अपनी लाभप्रदता (Profitability) कैसे बनाए रखें। एडमिनिस्ट्रेटिव लागतों में वृद्धि एक बड़ी चिंता का विषय हो सकती है।
धोखाधड़ी और वेरिफिकेशन का खेल
एक बड़ी चुनौती यह भी है कि क्लेम की प्रक्रिया आसान होने से धोखाधड़ी (Fraud) या अनावश्यक एडमिट होने के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है। इंश्योरेंस कंपनियों को अब थर्ड-पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (TPA) के साथ मिलकर मजबूत वेरिफिकेशन सिस्टम बनाने होंगे। एडवांस डेटा एनालिटिक्स की मदद से यह सुनिश्चित करना होगा कि एडमिट होना वास्तव में 'मेडिकली नेसेसरी' था। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां कितनी प्रभावी ढंग से इन दावों का सत्यापन कर पाती हैं, बिना असली ग्राहकों को परेशानी में डाले।
क्लेम रेश्यो और प्रीमियम पर प्रभाव
निवेशकों के लिए, 'क्लेम रेश्यो' (Claim Ratio) एक अहम पैमाना होगा, जो यह बताता है कि प्रीमियम के रूप में ली गई राशि का कितना हिस्सा क्लेम के रूप में चुकाया जा रहा है। अगर 2 घंटे के नियम के बाद क्लेम की संख्या में अचानक वृद्धि होती है, तो कंपनियों को अपने प्रीमियम की कीमतों में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है ताकि मार्जिन बना रहे। ICICI Lombard, Niva Bupa और Care Health जैसी कुछ कंपनियों ने इसे लागू करना शुरू कर दिया है, लेकिन बाकी इंडस्ट्री पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव का आकलन करने में समय लगेगा।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाले समय में निवेशकों को कुछ बातों पर खास ध्यान देना चाहिए। सबसे पहले, कंपनियों के मैनेजमेंट से पूछें कि इन छोटे-छोटे क्लेम का उनके क्लेम रेश्यो पर क्या असर पड़ रहा है। दूसरा, यह देखें कि कौन सी कंपनियां वेरिफिकेशन और एडमिनिस्ट्रेटिव लागतों को कम रखने के लिए टेक्नोलॉजी का प्रभावी ढंग से उपयोग कर रही हैं। अंत में, क्या इस बदलाव से हेल्थ इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स की री-प्राइसिंग (Repricing) शुरू होगी, इस पर नजर रखें। यह भी याद रखना महत्वपूर्ण है कि प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशंस (Pre-existing conditions) के लिए वेटिंग पीरियड और नेटवर्क हॉस्पिटल जैसी पुरानी शर्तें अभी भी लागू रहेंगी।
