मेडिकल इंफ्लेशन **12–14%** की दर से बढ़ रही है, जिसके चलते कई लोग हेल्थ इंश्योरेंस के बावजूद बड़ा बिल चुका रहे हैं। IRDAI के **2026** तक आने वाले सुधारों से पहले, पॉलिसी के सब-लिमिट और को-पे (Co-pay) के दांव-पेच को समझना बेहद जरूरी है।
भारत में कई लोग यह मानकर निश्चिंत हो जाते हैं कि उनके पास एक कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी है, लेकिन मेडिकल इमरजेंसी के समय उन्हें असलियत पता चलती है। 12% से 14% की सालाना दर से बढ़ रही मेडिकल महंगाई (Medical Inflation) के बीच कंपनियां अपनी शर्तों को और सख्त कर रही हैं, जिसका सीधा असर ग्राहक की जेब पर पड़ रहा है।
रूम रेंट का गणित
क्लेम कम मिलने की सबसे बड़ी वजह 'रूम रेंट कैप' है। कई पॉलिसियों में अस्पताल के अन्य खर्चों, जैसे सर्जन फीस, आईसीयू चार्ज और नर्सिंग खर्चों को कमरे के प्रकार से जोड़ दिया जाता है। यदि मरीज तय सीमा से महंगे कमरे में भर्ती होता है, तो इंश्योरेंस कंपनियां 'प्रो-राटा' (Pro-rata) कटौती करती हैं, जिससे क्लेम की रकम भारी मात्रा में घट जाती है।
को-पे और सब-लिमिट का जाल
प्रीमियम कम रखने के लिए 'को-पेमेंट' (Co-payment) का विकल्प दिया जाता है, जहां मरीज को बिल का एक निश्चित हिस्सा खुद भरना पड़ता है। इसके अलावा, मोतियाबिंद (Cataract) या रीढ़ की हड्डी जैसी सर्जरी पर 'सब-लिमिट' लगी होती है, जिससे वास्तविक खर्च कुछ भी हो, बीमा कंपनी एक तय सीमा से ज्यादा भुगतान नहीं करती।
IRDAI के सुधारों पर नजर
फिलहाल, रेगुलेटर IRDAI पारदर्शी बनाने के लिए बड़े सुधारों पर काम कर रहा है। 2026 के अंत तक एक कमेटी अपनी सिफारिशें सौंपेगी, जिससे इलाज की दरें मानकीकृत (Standardized) हो सकती हैं और हेल्थ क्लेम एक्सचेंज शुरू हो सकता है। तब तक, पॉलिसीहोल्डर्स को खुद ही बारीकियों की जांच करनी होगी।
'मटेरियल चेंज' क्लॉज का खतरा
निवेशकों और ग्राहकों को 'मटेरियल चेंज' (Material Change) क्लॉज पर नजर रखनी चाहिए। इसके तहत, रिन्यूअल के समय अगर आपको कोई नई बीमारी होती है, तो इंश्योरेंस कंपनी पॉलिसी की शर्तों या प्रीमियम में बदलाव कर सकती है। इसके अलावा, डिस्चार्ज समरी में छोटी सी गलती भी क्लेम रिजेक्शन का कारण बन सकती है। हालांकि, 60 महीने के बाद मिलने वाला 'मोरेटोरियम पीरियड' कुछ सुरक्षा जरूर देता है, लेकिन यह धोखाधड़ी या जानकारी छुपाने के मामलों में लागू नहीं होता।
