हेल्थ इंश्योरेंस से **18%** GST हटने के एक साल बाद भी पॉलिसीधारकों को राहत नहीं मिली है। प्रीमियम में **25% से 41%** तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिसके पीछे मेडिकल इंफ्लेशन और इनपुट टैक्स क्रेडिट का नुकसान मुख्य वजहें हैं।
प्रीमियम बढ़ने के पीछे का गणित
सरकार ने रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम से 18% GST हटाकर आम जनता को राहत देने की कोशिश की थी, लेकिन डेटा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। साल 2026 के रिन्यूअल डेटा के मुताबिक, पॉलिसीधारकों को 25% से 41% तक महंगी पॉलिसी मिल रही है। यह उन लोगों के लिए किसी झटके से कम नहीं है जिन्हें 18% की सीधी बचत की उम्मीद थी।
मेडिकल इंफ्लेशन का दबाव
इस महंगाई के पीछे सबसे बड़ा कारण है भारत में बढ़ती मेडिकल इंफ्लेशन, जो साल 2026 में 13% से 15% के बीच बनी हुई है। महंगी डायग्नोस्टिक टेक्नोलॉजी, स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी फीस और प्राइवेट अस्पतालों के बढ़ते खर्चों ने बेस प्रीमियम (Base Premium) को काफी ऊपर धकेल दिया है। इंश्योरेंस कंपनियों के लिए क्लेम सेटल करना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि इंडस्ट्री में क्लेम रेशियो अक्सर 90% के पार चला जाता है।
इनपुट टैक्स क्रेडिट का नुकसान
सितंबर 2025 से पहले, इंश्योरेंस कंपनियां अपने बिजनेस खर्चों (जैसे आईटी सर्विसेज या ऑफिस रेंट) पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा उठाती थीं। अब यह क्रेडिट सिस्टम खत्म हो गया है, जिससे कंपनियों का ऑपरेटिंग खर्च बढ़ गया है। इस बढ़े हुए खर्च को कंपनियां अब सीधे ग्राहकों से वसूल रही हैं।
उपभोक्ता क्यों कर रहे हैं अपग्रेड?
दिलचस्प बात यह है कि टैक्स में राहत का पैसा बचाने के बजाय, बहुत से लोग अब अपने प्लान को अपग्रेड कर रहे हैं। वे ज्यादा 'सम इंश्योर्ड' (Sum Insured) या बेहतर कवर की तरफ बढ़ रहे हैं। Niva Bupa और Bajaj General Insurance जैसी कंपनियों का कहना है कि उम्र बढ़ने या जगह बदलने के साथ प्रीमियम में बदलाव तो एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन अभी मार्केट में 'बेस प्रीमियम' का बढ़ना सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
