Policybazaar के आंकड़ों के अनुसार, अब लगभग **13%** हेल्थ इंश्योरेंस ग्राहक सालाना प्रीमियम के बजाय मासिक या तिमाही EMI का विकल्प चुन रहे हैं। यह बदलाव ग्राहकों को बड़ी एकमुश्त राशि के बोझ से बचाता है और पॉलिसी रिटेंशन को बेहतर बनाता है।
भारत में हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम भुगतान का तरीका तेजी से बदल रहा है। Policybazaar की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राहक अब पारंपरिक एनुअल (सालाना) पेमेंट मॉडल से हटकर फ्लेक्सिबल पेमेंट स्ट्रक्चर की ओर बढ़ रहे हैं। यह कदम परिवारों के बजट मैनेजमेंट के लिहाज से काफी अहम है।
ग्राहकों को क्या है फायदा?
सालाना प्रीमियम का एकमुश्त भुगतान कई परिवारों के लिए लिक्विडिटी प्रेशर पैदा करता है। प्रीमियम को मासिक या तिमाही EMI में बांटने से आम आदमी पर अचानक आर्थिक बोझ नहीं पड़ता और वे अपनी रेगुलर मंथली इनकम से इसे आसानी से मैनेज कर पा रहे हैं। मिडिल क्लास के लिए यह व्यापक कवरेज (Comprehensive Coverage) को अधिक सुलभ बनाने का एक कारगर तरीका है।
इंश्योरेंस कंपनियों के लिए मायने (Investors Perspective)
इन्वेस्टर्स और मार्केट एक्सपर्ट्स के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है। कंपनी के नजरिए से देखें, तो इससे 'पॉलिसी पर्सिस्टेंसी' यानी ग्राहक के लंबे समय तक जुड़े रहने की संभावना बढ़ती है। जब ग्राहक को साल में एक बार बड़ी रकम नहीं चुकानी पड़ती, तो पॉलिसी लैप्स होने या उसे कैंसिल करने के मामले कम हो जाते हैं। यह कंपनियों के लिए भविष्य में ज्यादा स्थिर रेवेन्यू का आधार बनता है।
छिपे हुए जोखिम भी हैं मौजूद
हालांकि, यह मॉडल नई चुनौतियां भी लाया है। अगर ग्राहक EMI समय पर नहीं भरता है, तो पॉलिसी लैप्स होने का खतरा बना रहता है। आमतौर पर मासिक प्लान्स में 15 दिन का ग्रेस पीरियड मिलता है, जिसके बाद कवरेज बंद हो सकती है। कंपनियों के लिए अब पेमेंट ट्रैकिंग सिस्टम को और अधिक मजबूत बनाना जरूरी हो गया है ताकि क्लेम सेटलमेंट में कोई बाधा न आए।
इसके अलावा, मल्टी-ईयर प्लान्स के साथ मिलकर ये EMI विकल्प ग्राहकों को हर साल होने वाली 10% तक की प्रीमियम बढ़ोतरी से भी सुरक्षा देते हैं, जिससे ग्राहकों को कॉस्ट सर्टेनिटी (Cost Certainty) मिलती है।
