क्या इंश्योरेंस कंपनियों के लिए मुश्किल दौर?
भारत के जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में पॉलिसीधारकों की नाराजगी बढ़ती जा रही है। फाइनेंशियल ईयर 2025 (FY25) में, इन सेक्टर्स में पॉलिसीधारकों की कुल शिकायतें 41% उछलकर 137,361 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि इस बात का सीधा संकेत है कि इंश्योरेंस कंपनियों पर क्लेम की बढ़ती लागतों का कितना दबाव है। कई मामलों में, कंपनी द्वारा कलेक्ट किए गए प्रीमियम का 120% से लेकर 140% तक सिर्फ क्लेम चुकाने में चला जाता है। इस 'कॉस्ट-पुश' डायनामिक के चलते मौजूदा इंश्योरेंस मॉडल की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी पर सवाल उठ रहे हैं।
क्लेम की संख्या बढ़ी, पर औसत भुगतान घटा: एक अजीब पहेली
FY25 में हेल्थ इंश्योरेंस के 32.6 मिलियन क्लेम सेटल किए गए, जो पिछले साल के 30.4 मिलियन से ज्यादा हैं। क्लेम के रूप में कुल ₹94,248 करोड़ का भुगतान किया गया। लेकिन, एक चौंकाने वाली बात सामने आई: प्रति क्लेम औसत भुगतान ₹31,086 (FY24) से घटकर ₹28,910 (FY25) हो गया। ऐसा तब हुआ है जब मेडिकल इन्फ्लेशन सालाना 12% से 14% की दर से बढ़ रहा है और अस्पतालों की बिलिंग प्रैक्टिसेस भी लगातार महंगी होती जा रही हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि छोटी क्लेम की संख्या बढ़ी है, या फिर क्लेम की प्रोसेसिंग तेज हुई है। फिर भी, हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां, खासकर स्टैंडअलोन हेल्थ इंश्योरर्स (SAHI), सबसे कम इनकर्ड क्लेम रेशियो का सामना कर रही हैं।
बाजार की उम्मीदें और असलियत का टकराव
सेक्टर की एक बड़ी कंपनी, Star Health and Allied Insurance, ने 20,527 शिकायतें दर्ज कीं, जो पिछले साल से 22% ज्यादा हैं। फरवरी 2026 की शुरुआत में, Star Health का स्टॉक अपने पीयर ग्रुप (अन्य कंपनियों) के औसत 20.35 के P/E रेशियो की तुलना में करीब 61.94 के ऊंचे P/E रेशियो पर ट्रेड कर रहा था। यह दिखाता है कि निवेशक हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट में भारी ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं – अनुमान है कि यह मार्केट 2032 तक 39.5 बिलियन डॉलर का हो जाएगा, जिसकी CAGR 13.1% रहने की उम्मीद है। स्टैंडअलोन हेल्थ इंश्योरर्स के लिए भी 20-22% CAGR का अनुमान है। लेकिन, बढ़ती ऑपरेशनल कॉस्ट्स और शिकायतों की बढ़ती संख्या इन उम्मीदों के सामने बड़ी चुनौती पेश कर रही है।
रेगुलेटर की कोशिशें और आगे की राह
भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (Irdai) इन मुद्दों को सुलझाने की कोशिश कर रहा है। Irdai ने कंपनियों से शिकायतों के मूल कारणों का पता लगाने और क्लेम सेटलमेंट की प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया है। इसके नतीजे भी दिखे हैं, FY25 में क्लेम सेटलमेंट रेशियो 87% तक पहुंच गया है और क्लेम रिजेक्ट होने का आंकड़ा लगभग 8% रह गया है। हालांकि, ये रेगुलेटरी कदम इन चुनौतियों से निपटने के लिए काफी नहीं हैं। सिस्टम में लगातार बढ़ती लागतें (जैसे मेडिकल इन्फ्लेशन) और अस्पतालों द्वारा अपनाई जाने वाली पारदर्शी न होने वाली प्राइसिंग प्रैक्टिसेस अभी भी एक बड़ी समस्या हैं। शिकायतों का बढ़ता ग्राफ यह दिखाता है कि क्लेम सेटलमेंट से जुड़े मुद्दे, खासकर बढ़ते मेडिकल खर्चों और अस्पतालों के रवैये के कारण, सेक्टर के सस्टेनेबल ग्रोथ के लिए एक गंभीर चुनौती बने हुए हैं।
