कई पॉलिसीधारकों को जानकारी के अभाव या गलत मेडिकल हिस्ट्री की वजह से क्लेम रिजेक्शन का सामना करना पड़ता है। केवल इंश्योरेंस होना ही काफी नहीं है, इमरजेंसी के समय आर्थिक नुकसान से बचने के लिए पॉलिसी की बारीकियों को समझना बेहद जरूरी है।
बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम भरने का मतलब है कि अस्पताल का सारा खर्च कंपनी उठाएगी। लेकिन, पॉलिसी सक्रिय होने के बावजूद कई बार दावों को खारिज कर दिया जाता है क्योंकि हम पॉलिसी के 'फाइन प्रिंट' को नजरअंदाज कर देते हैं।
मेडिकल हिस्ट्री छुपाना पड़ सकता है भारी
भारत में क्लेम रिजेक्ट होने की सबसे बड़ी वजह पुरानी बीमारियों (Pre-existing conditions) का खुलासा न करना है। अगर आपने पॉलिसी लेते समय किसी सर्जरी या बीमारी की जानकारी नहीं दी, तो इंश्योरेंस कंपनी अनुबंध को अमान्य कर सकती है। याद रखें, फॉर्म भरते समय एजेंट पर पूरी तरह निर्भर न रहें, बल्कि खुद सुनिश्चित करें कि आपकी मेडिकल हिस्ट्री सही दर्ज है।
पॉलिसी की बारीकियां और खर्च की सीमाएं
कई बार पॉलिसी वैध होने के बावजूद आपको अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसमें 'सब-लिमिट्स' बड़ा रोल निभाती हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि आपकी पॉलिसी में रूम रेंट की सीमा ₹5,000 प्रतिदिन है और अस्पताल आपसे ₹10,000 चार्ज करता है, तो अंतर की राशि आपको खुद भरनी होगी। इसी तरह 'को-पेमेंट' क्लॉज भी आपके कवर को कम कर सकता है।
कैशलेस सुविधा और वेटिंग पीरियड का सच
कैशलेस सुविधा का मतलब यह नहीं है कि कंपनी बिना जांच-परख के भुगतान कर देगी। अस्पताल और बीमा कंपनी के बीच ऑडिट प्रक्रिया होती है। इसके अलावा, 'वेटिंग पीरियड' के दौरान इलाज कराने पर भी क्लेम रिजेक्ट हो जाते हैं। पॉलिसी खरीदने के बाद एक निश्चित अवधि तक कुछ विशेष बीमारियों का कवर नहीं मिलता है।
क्लेम रिजेक्ट होने पर क्या करें?
अगर आपका क्लेम रिजेक्ट हो गया है, तो इसे अंतिम न मानें। सबसे पहले बीमा कंपनी से उस विशेष क्लॉज के बारे में पूछें जिसके आधार पर रिजेक्शन हुआ है। यदि आपको लगता है कि फैसला गलत है, तो आप कंपनी के इंटरनल ग्रीवेंस विभाग में शिकायत कर सकते हैं। समाधान न मिलने पर IRDAI के दिशानिर्देशों के तहत आप 'इंश्योरेंस ओंबड्समैन' (Insurance Ombudsman) का दरवाजा खटखटा सकते हैं। अपनी मेडिकल रिपोर्ट और डिस्चार्ज समरी को हमेशा सुरक्षित रखना आपके पक्ष में मजबूती का काम करेगा।
