मेडिकल इमरजेंसी के समय 'एयर एम्बुलेंस' सेवा जीवन रक्षक साबित होती है, लेकिन ज्यादातर हेल्थ इंश्योरेंस प्लान इसमें सीमित कवर ही देते हैं। पॉलिसी की सब-लिमिट्स और अप्रूवल शर्तों की अनदेखी आपकी जेब पर भारी पड़ सकती है।
एयर एम्बुलेंस सेवाएं सुदूर इलाकों में मरीजों के लिए जीवन बचा सकती हैं, लेकिन हेल्थ इंश्योरेंस में इनके कवरेज को लेकर कई बड़े गैप्स हैं। ज्यादातर पॉलिसी में एयर एम्बुलेंस का पूरा खर्चा नहीं मिलता, बल्कि इसमें ₹2.5 लाख से ₹5 लाख तक की सब-लिमिट्स तय होती हैं।
पॉलिसी स्ट्रक्चर का असर
पॉलिसी में यह सुविधा कैसे दी गई है, यह तय करता है कि अस्पताल का बिल कौन भरेगा। कुछ पॉलिसी में यह कवर बेस 'सम इंश्योर्ड' के साथ ही जुड़ा होता है, जिसका मतलब है कि अगर अस्पताल में बड़ा खर्च हुआ, तो एम्बुलेंस के लिए पैसे ही नहीं बचेंगे। इसके उलट, HDFC ERGO का 'Optima Secure' जैसे प्लान अतिरिक्त सुरक्षा देते हैं, जबकि 'Restore' प्लान में यह बेस कवर के अंदर ही सीमित रहता है। इसलिए पॉलिसी चुनते समय यह फर्क समझना बेहद जरूरी है।
एडमिनिस्ट्रेटिव बाधाएं और अप्रूवल
कवरेज की लिमिट के अलावा, सख्त प्रशासनिक नियम भी परेशानी बनते हैं। IFFCO-TOKIO General Insurance जैसी कंपनियां कैशलेस सुविधा के लिए अपने नेटवर्क वेंडर्स का उपयोग करती हैं। यदि पॉलिसीधारक कंपनी की प्रक्रिया का पालन किए बिना खुद से एम्बुलेंस अरेंज करता है, तो क्लेम रिजेक्ट होने का खतरा बना रहता है।
मेडिकल नेसेसिटी और डॉक्यूमेंटेशन
किसी भी क्लेम की वैलिडिटी 'मेडिकल नेसेसिटी' (Medical Necessity) पर टिकी है। इसके लिए डॉक्टर से स्पष्ट लिखित प्रमाण चाहिए कि मरीज की जान खतरे में थी और सड़क मार्ग से ले जाना असंभव था। IRDAI के निर्देशों के बावजूद, सारी रिपोर्ट जमा करने की जिम्मेदारी पॉलिसीधारक की होती है, और कुछ मामलों में क्लेम फाइल करने की डेडलाइन 30 दिन तक भी हो सकती है।
ट्रैवल इंश्योरेंस में गलती न करें
अक्सर लोग घरेलू ट्रैवल इंश्योरेंस को काफी मान लेते हैं, लेकिन उसमें 'इमरजेंसी मेडिकल इवेक्युएशन' का अलग से ऐड-ऑन (Add-on) लेना पड़ता है। एयर एम्बुलेंस का खर्च विमान के प्रकार और मेडिकल उपकरणों पर निर्भर करता है, इसलिए अपनी पॉलिसी के कॉन्ट्रैक्ट क्लॉज को पहले से समझना ही समझदारी है।
